लंदन: शोधकर्ताओं ने एक नई किस्म की खून जांच का पता लगाया है, जो यह बता सकता है कि कुछ रोगियों को दिल का दौरा पड़ने के बाद जान पर ज्यादा खतरा क्यों बना रहता है. शोधकर्ता ने कहा कि नोवल थैरेपी कोरोनरी सिंड्रोम वाले रोगियों में फाइब्रिन थक्का विश्लेषण इस रोग का सही निदान हो सकता है. Also Read - Farmers Death Kisan Andolan: Tikri Border पर किसानों की मौत से मातमी माहौल, जानिए कैसे हुई घटना

यूके की शेफील्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रॉब स्टोरे ने कहा, “हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि क्यों कुछ रोगियों को दिल का दौरा पड़ने के बाद अधिक खतरा होता है. हम आने वाले समय में नए उपचारों के साथ इसका निदान कैसे कर सकते हैं.” Also Read - BCCI President सौरभ गांगुली अस्‍पताल से हुए डिस्‍चार्ज, बोले- डॉक्‍टरों को धन्‍यवाद, मैं पूरी तरह से ठीक हूं

यूरोपियन हार्ट जरनल में प्रकाशित एक अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने तीव्र कोरोनरी सिंड्रोम के साथ 4,300 से ज्यादा अस्पताल से निकले मरीजों के रक्त प्लाज्मा नमूनों का विश्लेषण किया. उन्होंने थक्का के अधिकतम घनत्व को मापा और बताया कि थक्का बनने में लगे वाले समय को- क्लॉट लेसिस टाइम भी कहा जाता है. Also Read - शिवराज सिंह चौहान के ससुर का हुआ निधन, मुख्यमंत्री ने दी श्रद्धांजलि

अध्ययन में पाया गया कि सबसे लंबे समय तक थक्का रोग के रोगियों को हृदय रोग के कारण मायोकार्डियल इंफेक्शन या मृत्यु का 40 प्रतिशत ज्यादा जोखिम होता है. शोधकर्ताओं के अनुसार, यह शोध उन जोखिमों को कम करने के लिए नए लक्ष्य की पहचान करने मदद कर सकता है और अधिक प्रभावी उपचार भी कर सकता है.