देश की राजधानी में धूम्रपान न करने वाले बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं के लिए बुरी खबर है. दिल्ली के चिकित्सकों, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का कहना है कि राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण का स्तर इस हद तक खतरनाक स्थिति पर पहुंच चुका है कि यहां धूम्रपान नहीं करने वाले लोग भी रोजाना छह से सात सिगरेट पी रहे हैं, यानी धुआं निगल रहे हैं. पर्यावरणविद् और निरवाना बीइंग के संस्थापक जयधर गुप्ता ने बताया, “पीएम2.5 नैनो पार्टिकल होते हैं जो 2.5 माइक्रोन से छोटे होते हैं. यह किसी चीज के जलने, औद्योगिक प्रदूषण, वाहनों से निकलने वाले धुएं से पैदा होते हैं. पंखे पर जो काला कार्बन चिपक जाता है वह पीएम 2.5 होता है. यह हमारी हवा में भरा हुआ है.”Also Read - Skin Care From Pollution: प्रदूषण की वजह से आपकी स्किन को हो सकते हैं कई सारे गंभीर नुकसान, जानें कैसे करें उनकी देखभाल

उन्होंने कहा, “डब्लूएचओ के मानकों के मुताबिक, इसका सुरक्षित स्तर 15 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है. जबकि 2016 में पूरे साल का औसत था 143 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर, जो कि 90 फीसदी से भी ज्यादा था. वैज्ञानिकों ने कहा कि पर्यावरण में जब पीएम2.5 का स्तर 22 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर हो तो वह एक सिगरेट के बराबर होता है. उस हिसाब से 143 से जब इस संख्या को भाग करते हैं तो दिन की करीब 6 से सात सिगरेट बनती हैं. इतनी सिगरेट केवल हम सांस लेकर फूंक रहे हैं.” Also Read - Pollution Control Diet: लगातार बढ़ रहे प्रदूषण में ऐसे बढ़ाएं अपनी इम्यूनिटी, आपके फेफड़े रहेंगे स्वस्थ

जयधर गुप्ता ने कहा, “सर्दियों में जब पाली जलाने की शुरूआत होती है और उसका धुआं जब यहां पहुंचता है तो राष्ट्रीय राजधानी में पीएम2.5 का स्तर 1000 से लेकर 1200 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक पहुंच जाता है, तब यह संख्या बढ़कर 40 से 50 सिगरेट के बराबर पहुंच जाती है.” इस खतरनाक वायु प्रदूषण से सुरक्षा के सवाल पर पर्यावरणविद् ने कहा, “इससे बचने का एकमात्र उपाय है एन-95 मास्क, इसके अलावा लोगों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है. इसके अलावा सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है. जिस चीज से धुआं पैदा होता है हमें उसे खत्म करना होगा तभी इसी स्थिति से निपटा जा सकता है.” Also Read - दिल्ली में नहीं दिख रहा प्रदूषण कम होने का आसार, लगातार चौथे दिन भी स्थिति गंभीर

उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले लंग केयर फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. अरविंद कुमार ने कहा था कि 10 साल पहले तक मैं देखता था कि जो 90 प्रतिशत फेफेड़ों के कैंसर के मामले आते थे वो धूम्रपान करने वाले लोगों के होते थे लेकिन अब इसकी संख्या 50 फीसदी हो गई है. क्योंकि 50 फीसदी मामले अब धूम्रपान नहीं करने वालों के आ रहे हैं जिन्हें फेफड़ों का कैंसर हो रहा है.