टोरंटो: अनुसंधानकर्ताओं ने एक ऐसी संभावित दवा विकसित की है, जो दिल के दौरे का इलाज करने और हृदयघात से बचाने में कारगर है. इन दोनों ही स्थितियों के लिए फिलहाल कोई उपचार मौजूद नहीं है.

एक अध्ययन में पाया गया कि दिल का दौरा पड़ने से हृदय में सूजन बढ़ जाती है और दिल में एक जख्म बन जाता है, जिससे आगे चलकर हृदयघात होने की आशंका बढ़ जाती है. यह एक लाइलाज स्थिति है.

प्रेग्नेंसी के दौरान सोने के तरीके से बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है असर, जानिए क्या है सही पॉजिशन

इस दवा को विकसित करने वालों में कनाडा के गुलेफ विश्वविद्यालय के शोधकर्ता भी शामिल हैं. उनका कहना है कि दवा दिल में जख्म बनने से रोकती है और मरीजों के लिए जीवन भर हृदय संबंधी दवाएं लेने की जरूरत को खत्म करेगी.

उन्होंने कहा कि यह दवा सर्कैडीअन रिदम कहे जाने वाले हमारे शरीर के प्राकृतिक समय-चक्र के आधार पर काम करती है. यह अध्ययन ‘नेचर कम्युनिकेशन्स बायोलॉजी’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है.

World Heart Day: ‘तकनीकी क्रांति’ से इस बीमारी को मात देने की कोशिश में हैं डॉक्टर्स, इलाज बना सरल

संयुक्त राष्ट्र (United Nation) की एक रिपोर्ट के अनुसार हार्ट संबंधित बीमारियां मौतों का प्रमुख कारण है. खासकर निम्न एवं मध्यम आय वर्ग वाले देशों में. अकेले भारत में ही 2015 में इससे दो मिलियन (20 लाख) मौतें हुईं, इनमें 1.3 मिलियन का आंकड़ा 30 से 63 वर्ष की आयु वर्ग के बीच के लोगों का है.

ऐसे में जब विश्व इन बीमारियों से लड़ने के लिए संघर्ष कर रहा है, तब हाल ही में हुई तकनीकी क्रांति ने स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र को नए आयाम दिए हैं और बीमारियों को देखने और उनके निवारण को नई दृष्टि प्रदान की है. चूंकि यह विषय गंभीर बीमारियों का है, इसलिए जल्दी पता लगाया जाना, सटीक परीक्षण और तय समय पर उपचार अच्छे परिणामों के लिए महत्वपूर्ण है. कार्डियेक साइंस में हुई प्रगति ने तकनीक की मदद से निदान और उपचार को सरल बनाया है.

रोजाना की ये 6 आदतें कर सकती हैं आपके दिल को बीमार… बहुत बीमार

डाग्यनोस्टिक प्रोसिजर में तरक्की
कार्डियेक संबंधी बीमारियों में समय पर पता लगाना महत्वपूर्ण होता है. वर्ष 1990 तक दिल में किसी भी प्रकार की रुकावट एवं परेशानी का पता लगाने के लिए कार्डियोलॉजिस्ट केवल साधारण ईसीजी और एंजियोग्राफी पर निर्भर रहते थे. तनाव परीक्षण, कम्प्यूटरीकृत टोमोग्राफी, कार्डियेक एमआरआई और आधुनिक इको ने कार्डियोवेस्क्यूलर साइंस को देखने के नजरिए में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं.

इन्ट्रावेस्क्यूलर कॉरेनरी अल्ट्रासाउंड, ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी और इलेक्ट्रॉन बीम कम्प्यूटराईज्ड टोमोग्राफी ने कार्डियोवेस्क्यूलर निदान को नई उचाइयां दी हैं. थ्री डी इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिक मेपिंग और फंक्शनल फ्लो रिजर्व तकनीक ने कार्डियेक एरेथिमा और एथ्रेस्कोलोरोसिस जैसी बीमारियों के प्रबंधन और समझ पर गहरा प्रभाव डाला है.

Tips: रोज करेंगे ये 6 काम, जिंदगी भर नहीं पड़ेंगे बीमार…

बायोसेंसर्स और अन्य उपकरणों ने ना केवल परीक्षण प्रक्रिया को आसान बना दिया है, बल्कि परिणामों को सटीक और तेज गति में ला दिया है. उदाहरण के लिए हाईली स्पेशलाइज्ड माइक्रोचिप्स जैसी तकनीकों ने कई बीमारियों जिनमें सीवीडी भी शामिल है, मरीज के रक्त, स्लाईवा या यूरिन की एक बूंद से बेट्री टेस्ट से पता लगाने में सफलता हासिल की है. यह माइक्रोचिप्स इस तरह प्रोगाम्ड है कि विशेष प्रोटिन्स या जेन एक्सप्रेशंस जो कि विशेष बीमारियों की पहचान होती है का पता लगा देती हैं.

(इनपुट-भाषा)