लंदन: सोशल मीडिया का टीकाकरण के बारे में दुष्प्रचार फैलाने के लिए उत्तरोतर इस्तेमाल किया जा रहा है और पांच में कम से कम दो अभिभावकों को टीकों को लेकर नकारात्मक संदेशों से वास्ता पड़ता है.Also Read - PM Modi to Address Nation: आज सुबह 10 बजे राष्ट्र को संबोधित करेंगे पीएम नरेंद्र मोदी

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ब्रिटेन की रॉयल सोसायटी फॉर पब्लिक हेल्थ (आरएसपीएच) की एक रिपोर्ट में ऐसा कहा गया है. इस रिपोर्ट के अनुसार टीकों के संभावित दुष्प्रभावों के बारे में लोगों के मन में ऐसी धारणा बन जाती है कि वे (अपने बच्चों को) टीके नहीं लगवाना चाहते हैं. खसरे, गलसुआ, रुबेला (एमएमआर), इंफ्लूएंजा समेत विभिन्न बीमारियों के टीकों के संभावित दुष्प्रभावों को लेकर डर ऐसा होता है कि लोग टीका नहीं लगवाना चाहते हैं. वैसे तो सभी टीकों में संभावित दुष्प्रभाव होते हैं लेकिन वे महज चंद लोगों पर ही असर डालते हैं और वे भी बहुत मामूली असर होते है तथा थोड़े समय के लिए होते हैं. ये मामूली असर उनके फायदे के समक्ष नगण्य हैं. Also Read - बदलने वाला है Facebook का नाम! जानिए आखिर क्यों लिया मार्क जुकरबर्ग ने इतना बड़ा फैसला

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हाल के वर्षों में खसरों की दर में तेजी

आरएसपीएच की मुख्य कार्यकारी शिरली क्रैमर ने कहा कि एंड्री वेकफील्ड ने एमएमआर टीके और स्वलीनता के बीच कथित संबंध को लेकर जो अपना कुख्यात शोधपत्र प्रकाशित कराया था और जिसकी अब व्यापक रुप से कोई साख नहीं है, उसके अब 21 साल हो गये हैं लेकिन यूरोप अब भी उसके प्रभाव के गिरफ्त में है. हमने हाल के वर्षों में खसरों की दर में तेजी देखी है. क्रैमर ने कहा कि 21 वीं सदी में टीके से रोकी जा सकने वाली बीमारियों की वापसी होने देना अस्वीकार्य है. ऐसे में यह अहम है कि हम ऐसा सब कुछ करें जो हम कर सकते हैं ताकि ब्रिटेन टीकाकरण में अपना वैश्विक नेता का दर्जा कायम रख सके.

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