नई दिल्‍ली: बिग बैंग थ्‍योरी के साथ ब्रह्मांड को लेकर लोगों की धारणा बदलने वाले स्‍टीफन हॉकिंग का बुधवार 14 मार्च को देहांत हो गया. वह 76 साल के थे. हॉकिंग का जन्‍म 8 जनवरी 1942 को हुआ था. स्‍टीफन हॉकिंग की मौत मोटर न्‍यूरॉन नाम की एक बीमारी के कारण हुई है. एक ऐसी बीमारी जिसमें सारे अंग काम करना बंद कर देते हैं. यही वजह है कि आपने स्‍टीफन को हमेशा व्‍हील चेयर पर ही देखा होगा.

दुनिया में बस कुछ लोगों को ही यह बीमारी होती है. यह कहना ठीक रहेगा कि यह रेयर डिजीज है. लेकिन यह बीमारी होती कैसे और इसका इलाज क्‍या है. यह सारी जानकारी हम आपका यहां दे रहे हैं. जानें…

दरअलस, यह बीमारी स्टीफन को बचपन से नहीं थी. वह जब 21 साल के थे तब उन्‍हें डॉक्‍टर ने बताया कि उन्‍हें मोटर न्‍यूरॉन नाम की बीमारी है. साथ ही डॉक्‍टर ने यह भी कह दिया कि इस बीमारी के साथ वह ज्‍यादा दिनों तक जिंदा नहीं रह सकते. कुछ महीनों में ही उनकी मौत हो जाएगी. लेकिन स्‍टीफन इस जानलेवा बीमारी से ग्रस्‍त होने के बावजूद और 54 साल तक जिंदा रहे. उनका देहांत 76 साल की उम्र में हुआ है.

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मोटर न्‍यूरॉन की इस बीमारी में शरीर की नसों पर हमला होता है. लिहाजा, एक-एक कर शरीर के सारे अंग काम करना बंद कर देते हैं. फिर व्‍यक्‍त‍ि चल-फिर भी नहीं पाता.

इस रोग की वजह से स्‍टीफन को कुछ दिनों बाद उठने-बैठने चलने-फिरने में दिक्‍कत होने लगी. एक दिन ऐसा भी आया जब उनकी आवाज ने काम करना बंद कर दिया. लेकिन स्‍टीफन अपनी इच्‍छाशक्‍त‍ि के दम पर खुद को वर्षों तक जिंदा रखने में कामयाब रहे. उन्‍होंने अपनी विकलांगता को हावी नहीं होने दिया और इसी स्‍थ‍िति में रहते हुए उन्‍होंने बिग बैंग थ्‍योरी व ब्‍लैक होल जैसे खोज किए.

स्‍टीफन को कैसे पता चला इस बीमारी का…
दुनिया में केवल 5 प्रतिशत लोग ही हैं, जिन्‍हें यह बीमारी होती है. यह माना जाता है कि इस बीमारी से ग्रसित लोग ज्‍यादा से ज्‍यादा 10 साल तक ही जिंदा रह पाते हैं. यह बीमारी रीढ़ की जुड़ी कोशिकाओं से शुरू होती है. इसलिए रोगी को सबसे पहले पीठ में दर्द का एहसास होता है और फिर बाद में उसे उठने-बैठने में तकलीफ होने लगती है. बीमारी ज्‍यादा बढ़ने पर रोगी को चलने-फिरने खाने-पीने में भी तकलीफ होने लगती है. दरअसल, इस बीमारी के कारण वह अपना मुंह ही नहीं खोल पाता.

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यह बीमारी मूल रूप से जेनेटिक बीमारी है. यानी घर में किसी को यह बीमारी है तो उस परिवार में किसी और सदस्‍य को भी यह बीमारी हो सकती है. यदि किसी को फ्रंटोटेंपोरल डिमेंशिया नाम की दिमागी बीमारी है, तो वह भी इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं. ज्यादातर मामलों के लिए जीन ही जिम्मेदार होते हैं.

वर्तमान में इस बीमारी का कोई उपचार नहीं है. लेकिन इसके लक्षणों को कुछ समय के लिए दवाओं के दम पर कम किया जा सकता है. जैसे कि सांस लेने के लिए ब्रीदिंग मास्‍क का प्रयोग किया जाता है, खाने के लिए फीडिंग ट्यूब का प्रयोग किया जाता है. स्टीफन हॉकिंग ने भी खुद को ऐसे ही तकनीक के दम पर जिंदा रखा था.