नई दिल्ली: आज विश्व हृदय दिवस (World Heart Day) है. संयुक्त राष्ट्र (United Nation) की एक रिपोर्ट के अनुसार हार्ट संबंधित बीमारियां मौतों का प्रमुख कारण है. खासकर निम्न एवं मध्यम आय वर्ग वाले देशों में. अकेले भारत में ही 2015 में इससे दो मिलियन (20 लाख) मौतें हुईं, इनमें 1.3 मिलियन का आंकड़ा 30 से 63 वर्ष की आयु वर्ग के बीच के लोगों का है. ऐसे में जब विश्व इन बीमारियों से लड़ने के लिए संघर्ष कर रहा है, तब हाल ही में हुई तकनीकी क्रांति ने स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र को नए आयाम दिए हैं और बीमारियों को देखने और उनके निवारण को नई दृष्टि प्रदान की है. चूंकि यह विषय गंभीर बीमारियों का है, इसलिए जल्दी पता लगाया जाना, सटीक परीक्षण और तय समय पर उपचार अच्छे परिणामों के लिए महत्वपूर्ण है. कार्डियेक साइंस में हुई प्रगति ने तकनीक की मदद से निदान और उपचार को सरल बनाया है.

डाग्यनोस्टिक प्रोसिजर में तरक्की
कार्डियेक संबंधी बीमारियों में समय पर पता लगाना महत्वपूर्ण होता है. वर्ष 1990 तक दिल में किसी भी प्रकार की रुकावट एवं परेशानी का पता लगाने के लिए कार्डियोलॉजिस्ट केवल साधारण ईसीजी और एंजियोग्राफी पर निर्भर रहते थे. तनाव परीक्षण, कम्प्यूटरीकृत टोमोग्राफी, कार्डियेक एमआरआई और आधुनिक इको ने कार्डियोवेस्क्यूलर साइंस को देखने के नजरिए में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं. इन्ट्रावेस्क्यूलर कॉरेनरी अल्ट्रासाउंड, ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी और इलेक्ट्रॉन बीम कम्प्यूटराईज्ड टोमोग्राफी ने कार्डियोवेस्क्यूलर निदान को नई उचाइयां दी हैं. थ्री डी इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिक मेपिंग और फंक्शनल फ्लो रिजर्व तकनीक ने कार्डियेक एरेथिमा और एथ्रेस्कोलोरोसिस जैसी बीमारियों के प्रबंधन और समझ पर गहरा प्रभाव डाला है. बायोसेंसर्स और अन्य उपकरणों ने ना केवल परीक्षण प्रक्रिया को आसान बना दिया है, बल्कि परिणामों को सटीक और तेज गति में ला दिया है. उदाहरण के लिए हाईली स्पेशलाइज्ड माइक्रोचिप्स जैसी तकनीकों ने कई बीमारियों जिनमें सीवीडी भी शामिल है, मरीज के रक्त, स्लाईवा या यूरिन की एक बूंद से बेट्री टेस्ट से पता लगाने में सफलता हासिल की है. यह माइक्रोचिप्स इस तरह प्रोगाम्ड है कि विशेष प्रोटिन्स या जेन एक्सप्रेशंस जो कि विशेष बीमारियों की पहचान होती है का पता लगा देती हैं.

World Heart Day: रोजाना की ये 6 आदतें कर सकती हैं आपके दिल को बीमार… बहुत बीमार

पर्सनल टेक्नोलॉजी भी एक लहर की तरह बढ़ी है, जिसने कार्डियेक केयर क्षेत्र में चमत्कृत करने वाले बदलाव किए हैं. स्मार्टफोन ऐप्स, इम्प्लांट्स और वेयरेबल्स से मरीज का रियल टाइम डाटा मिलना बढ़ा है. कई बार स्ट्रोक या हार्ट अटैक साइलेंटली आता है और इसमें परम्परागत लक्षण मौजूद नहीं रहते. यह डिवाइस इन बदलावों एवं लक्षणों को पहचान लेते हैं जो आमतौर पर मरीज या उनके परिजनों की पकड़ में नहीं आ पाते हैं. ऑटोमेटेड मॉनीटरिंग डिवाइस के उपयोग से हम प्रत्येक बात का रिकॉर्ड रख सकते हैं कि हम दिनभर में कितने कदम चले, हमारा बीपी और हार्ट रेट कितना बढ़ा या घटा और विपरित परिस्थितियों में डॉक्टर को सिग्नल भेज देते हैं. मरीज हमेशा मेडिकल निगरानी में रहता है और आवश्यकता पड़ने पर उसे आकस्मिक मेडिकल सहायता मिल जाती है.

प्रिवेंटिंग ड्रग्स और उपचार
ह्यूमन जिनोम प्रोजेक्ट, बायोइन्फॉर्मेटिक्स और ड्रग डिजाइनिंग तीनों मिलकर कार्डियोवेस्क्यूलर साइंस की दवाओं के क्षेत्र में बेहतरीन बदलाव लेकर आए हैं. इन क्षेत्रों ने जानकारियों के एक क्षेत्र को खोल दिया है. इसने शोधकर्ताओं को ना सिर्फ कई बीमारियों के निदान के लिए नई दवाओं को बनाने में सक्षम बनाया है, बल्कि ड्रग रिस्पांस और इसके प्रभाव पर नई समझ दी है. नई उपचार विधियों का उद्देश्य हार्ट डिसिज के उपचार के बेहतर परिणाम प्राप्त करना और समय पूर्व होने वाली मृत्यु को रोकना है. अब हार्ट फेलियर को रोकने वाली दवाएं उपलब्ध हैं जो जल्द मिले संकेतों का निदान कर मरीज का जीवन बचाने और जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने में कारगर हैं. दवाएं जिनमें बेटा ब्लॉकर्स, ऐसीई इन्हिबिटर्स, वाटर पिल्स, एल्डोस्ट्रोन, ऐंटाजोनिस्ट्स (यह शरीर में नमक और पानी की मात्रा को कम कर देता है) और एजेंयोस्टेसिन टू रिसेप्टर ब्लॉकर्स शामिल हैं, ब्लड प्रेशर एवं हार्ट रेट में असामान्य बदलाव को नियंत्रित करता है.

इन बाहरी दवाओं के अलावा कई अन्य इम्प्लांट्स, कृत्रिम वाल्व और पम्प भी शामिल हैं. जो गंभीर कार्डियेक एलिमेंट्स के प्रबंधन में मदद करते हैं. कार्डियोवर्टर डिफ्रिबिलेटर्स, लेडलेस पेसमेकर और इंटरनल टेलिमेट्रिक मॉनिटर्स आसानी से शरीर या स्कीन में इम्प्लांट हो जाते हैं. यह ना सिर्फ मरीज को घर पर मॉनिटर करने में मदद करते हैं, बल्कि जीवन को संकट में डालने वाले संकेतों एवं बदलावों का पता लगाकर मेडिकल इमरजेंसी को टालने एवं निदान करने में भी सक्षम हैं.

ये लेख अगत्सा की मेडिकल एडवाईजर प्रो. अन्बु पंडियन द्वारा लिखा गया है.