नई दिल्ली। 2019 चुनाव नजदीक आते आते चुनावी माहौल रंग पकड़ता जा रहा है. हालिया उपचुनाव में बीजेपी को मिली करारी शिकस्त के बाद सियासी हालात दिलचस्प बन पड़े हैं. बीजेपी के सहयोगी दल भी अब अपने तेवर साफ करने लगे हैं. एनडीए के कमजोर पड़ते ही दोस्तों मोलभाव के लिए अभी से दबाव बनाना शुरू कर दिया है. सबसे पहले दबाव बनाने का काम शुरू किया है बिहार में बीजेपी की सहयोगी जेडीयू ने. जेडीयू ने अभी से अपने इरादे साफ कर दिए हैं.

जेडीयू ने ठोका 25 सीटों पर दावा

रविवार को जेडीयू ने साफ कर दिया कि बिहार में वही एनडीए का चेहरा है इसलिए सीट बंटवारे में उसे ज्यादा हिस्सा मिलना चाहिए. पार्टी प्रवस्ता अजय आलोक ने कहा कि बिहार में जेडीयू को लोकसभा की 40 सीटों में से 25 सीटें मिलनी चाहिए. उन्होंने कहा कि केंद्र में नरेंद्र मोदी एनडीए का जबकि बिहार में नीतीश कुमार ही एनडीए का चेहरा हैं. उनके इस बयान के बाद कयासबाजी तेज हो गई है कि क्या बिहार में कोई पेच फंसेगा.

मीटिंग से पहले जेडीयू का संदेश: बिहार में NDA का चेहरा हैं नीतीश, 25 सीटों पर लड़ेगी पार्टी

जेडीयू ने अभी से बनाया दबाव

जेडीयू के इस बयान को 2019 आम चुनाव में उसकी ओर से बीजेपी पर दबाव बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. मौजूदा हालात को देखते हुए जेडीयू के दावे को बीजेपी सीधे सीधे खारिज भी नहीं कर सकती. बीजेपी की ओर से इसका प्रत्यक्ष विरोध भी नहीं जताया गया है लेकिन सीटों पर दावों हामी भी नहीं भरी गई है. बीजेपी नेता और बिहार के डिप्टी सीएम सुशील मोदी ने कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है कि नीतीश ही बिहार में एनडीए का चेहरा हैं, तो विवाद कहां है.

बीजेपी के लिए मुश्किल दौर

गहराई से पड़ताल करें तो पाएंगे की जेडीयू का ये दांव बीजेपी के लिए मुसीबत खड़ी करने वाला है. बिहार में लोकसभा की कुल 40 सीटें हैं. ऐसे में अगर 25 सीटें जेडीयू के हवाले कर दी जाएंगी तो एनडीए को बाकी दलों का क्या होगा. रामविलास पासवान की एलजेपी और कुशवाहा की आरएलएसपी को कितनी सीटें दी जाएंगी. और फिर बीजेपी के पास अपने लिए क्या बचेगा. जेडीयू के दावे को लेकर यहीं पर सबसे बड़ा पेच है. अगर बीजेपी मान भी जाती है तो बाकी दो दल क्या जेडीयू के आगे झुक जाएंगे?

एनडीए कमजोर, बीजेपी की ताकत घटी

जेडीयू का ये दांव बताता है कि बीजेपी के लिए आने आना वक्त कितना मुश्किल भरा है. एनडीए लगातार कमजोर हो रहा है और हालिया चुनाव में बीजेपी को कई बड़े झटके लगे हैं. एनडीए का एक बड़ा घटक दल टीडीपी अलग हो चुका है. लोकसभा में इसके 18 सांसद हैं. शिवसेना ने भी बीजेपी से मुंह मोड़ लिया है और दोनों एक दूसरे के साथ विपक्ष की तरह पेश आ रहे हैं. खुद बीजेपी भी कमजोर हुई है ओर उसके 273 सांसद ही रह गए हैं जबकि 2014 चुनाव में उसने 282 सीटें जीती थीं. एक के बाद एक उपचुनाव गंवाने के कारण वह 273 तक पहुंच गई है.

महागठबंधन की चुनौती सामने

इन हालातों में बीजेपी मोलभाव की स्थिति में नहीं रह गई है. अगर उसने थोड़ा भी सख्त रुख दिखाया तो उसके साथी छिटककर संभावित महागठबंधन का हिस्सा बन सकते हैं. सियासी हालात ऐसे बन पड़े हैं कि किसी को भी किसी पार्टी का साथ लेने से गुरेज नहीं रह गया है. बीजेपी के दो बड़े साथी टीडीपी और शिवसेना उससे अलग हो चुके हैं. ऐसे में सिर्फ जेडीयू जैसी ही बड़ी पार्टी उसके साथ रह गई है और उसे नाराज करना आत्मघाती कदम होगा. उससे भी बड़ी मुश्किल ये है कि अगर बाकी बचे दल भी ऐसी मांग सामने रख दे तो बीजेपी कैसे उनसे निपटेगी?