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- 22 Years Ago Atal Bihar Vajpayee Government And Today Karnataka Election Crisis
कर्नाटक के सियासी संकट के बीच आखिर क्यों याद आ रहे हैं वाजपेयी?
ऐसी स्थिति में 22 साल पहले राष्ट्रीय स्तर पर हुई एक घटना याद आती है. साल 1996 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई थी.
नई दिल्ली. कर्नाटक चुनाव में बीजेपी 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है. इसे देखते हुए गवर्नर ने उसे सरकार बनाने का न्यौता दिया और येदियुरप्पान ने सीएम पथ की शपथ ली. लेकिन, इस बीच कांग्रेस और जेडीएस भी साथ आ गईं और उन्होंने दावा किया कि उनके गठबंधन के पास पूर्ण बहुमत है और गवर्नर उन्हें सरकार बनाने का न्यौता दे. इस बीच गवर्नर वजुभाई के निर्णय भी विवादों में रहें. चुनावी गणित से साफ दिखता है कि बीजेपी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है, जबकि कांग्रेस जेडीएस के पास बहुमत है.
बीजेपी के पास बहुमत नहीं होने के बाद भी वह लगातार दावा कर रही है कि वह फ्लोर टेस्ट में बहुमत साबित कर देगी. उसने दावा किया कि जेडीएस के कुछ विधायक, कांग्रेस के कुछ विधायक और दो निर्दल विधायक उसके संपर्क में हैं. ऐसी स्थिति में 22 साल पहले राष्ट्रीय स्तर पर हुई एक घटना याद आती है. साल 1996 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई थी. उसे सरकार बनाने का न्यौता मिला, जोकि 13 दिन में ही गिर गया. हम आपको बताते हैं कि क्या हुआ था उस समय.
साल 1996 का चुनाव था
साल 1996 में लोकसभा चुनाव पीवी नरसिम्हा राव की सरकार गई थी. बाबरी मस्जिद विध्वंस के 4 साल हुए थे और हवाला कांड की देश में गूंज थी. इसी बीच बीजेपी ने अटल बिहारी वाजपेयी को पार्टी का चेहरा बना दिया. उन्होंने ”पार्टी विद दिफरेंस’ की बात के साथ-साथ उग्र राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के एजेंडा के साथ प्रचार शुरू किया. इस दौरान बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई. उसे 161 सीट मिली. वहीं कांग्रेस गठबंधन को 140 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा. इस दौरान क्षेत्रिय पार्टी और लेफ्ट के हाथों में सत्ता की कुंजी चल गई.
क्या हुआ था
सबसे बड़ी पार्टी के नाते बीजेपी ने सरकार बनाने का दावा पेश किया. राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने बाजपेयी को सरकार बनाने का न्यौता दिया. बाजपेयी ने पीएम पद की शपथ ली और उन्होंने सदन में दो हफ्ते में बहुमत सिद्ध करने का मौका मिला. बीजेपी ने क्षेत्रिय पार्टियों के साथ गठबंधन किया. लेकिन 13 दिन बाद 28 मई को बाजपेयी ने ऐतिहासिक भाषण दिया. इसके बाद ही उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. कांग्रेस ने निर्णय लिया कि वह सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करेगी और जनता दल को सपोर्ट करेगी, जिसके पास 46 सांसद थे. जनता दल ने उस दौर में लेफ्ट और दूसरी पार्टियों के साथ एक यूनाइटेड फ्रंट बनाया था.
दो बार बदले प्रधानमंत्री
यूनाइटेड फ्रंट ने अंदरखाने से पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह को समर्थन की बात की, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया. इसके बाद वे सबसे ज्यादा समय तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु के पास पहुंचे. लेकिन, कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्स्सित) ने इससे इनकार कर दिया. इसके बाद एडी देवगौड़ा को पीएम का चेहरा बनाया गया. ये सरकार एक साल तक चली, जब कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया. इसके बाद यूनाइटेड फ्रंट ने इंद्र कुमार गुजरात को नेता बनाया और वह प्रधानमंत्री बने. लेकिन ये सरकार भी नहीं चल पाई.
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