नई दिल्ली. मध्यप्रदेश की भोपाल लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार प्रज्ञा ठाकुर (Pragya Thakur) ने शुक्रवार को 26/11 आतंकी हमलों के शहीद हेमंत करकरे (Hemant Karkare) पर उन्हें प्रताड़ित करने के आरोप लगाए. ठाकुर ने अपने विवादित बयान में कहा कि उन्होंने ही करकरे को श्राप दिया, जिसके कारण आतंकवादियों ने इस पुलिस अधिकारी की हत्या कर दी. भोपाल में कांग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरी ठाकुर के इस बयान पर बवाल मचा और विपक्षी दलों समेत देशभर के संगठनों ने इसकी निंदा की तो बाद में उन्होंने इसे वापस ले लिया. इस पूरे घटनाक्रम से न सिर्फ वर्ष 2008 में हुए मालेगांव धमाकों (Malegaon Blast) की याद ताजा हो गई, बल्कि भगवा आतंकवाद पर विवाद भी शुरू हो गया. इसके साथ ही मीडिया में तत्कालीन आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) के प्रमुख और जांबाज आईपीएस हेमंत करकरे द्वारा इस आतंकी हादसे की जांच करने और प्रज्ञा ठाकुर को गिरफ्तार करने के किस्से भी आने लगे.

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गुजरात के सूरत से खरीदी बाइक से हुआ था विस्फोट
दरअसल, एटीएस चीफ हेमंत करकरे को मालेगांव धमाके के एक दिन बाद ही इस आतंकी हादसे का ‘ठोस सबूत’ मिल गया था, जिसके आधार पर उन्होंने प्रज्ञा ठाकुर को गिरफ्तार कर लिया. अंग्रेजी अखबार इकोनॉमिक टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, 30 सितंबर 2008 को हुए मालेगांव धमाके के बाद घटनास्थल पर पहुंचे हेमंत करकरे को सबसे पहला सबूत मिला था, वह थी पीले रंग की एलएमएल फ्रीडम मोटरसाइकिल, जिसमें बम रखे गए थे. यह इस घटना का सबसे पहला सुराग था. हादसे की जांच शुरू करने के अगले एक महीने में ही एटीएस ने इस मोटरसाइकिल के खरीदार का पता लगा लिया था.

एलएमएल फ्रीडम मोटरसाइकिल के इंजन नंबर E55OK261886 के आधार पर एटीएस ने यह पता लगा लिया था कि यह बाइक गुजरात के सूरत की एक एजेंसी से खरीदी गई थी. सिद्धी एजेंसी नामक डीलर ने यह बाइक सूरत में रहने वाली प्रज्ञा ठाकुर को बेची थी. प्रज्ञा ठाकुर उस समय इंदौर में थी, जब एटीएस ने उन्हें सम्मन भेजा. इसी सबूत के आधार पर एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे ने प्रज्ञा ठाकुर को गिरफ्तार कर लिया. बाद में पूछताछ के दौरान प्रज्ञा ठाकुर ने एटीएस को लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय और स्वयंभू संत दयानंद पांडेय का नाम बताया था.

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सनातन संस्था पर बैन लगाने की सिफारिश
इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, भगवा आतंकवाद को लेकर चले बहस के बीच महाराष्ट्र एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे का नाम आना स्वाभाविक ही है. क्योंकि यह हेमंत करकरे ही थे जिन्होंने मालेगांव धमाकों के बाद मुंबई के वासी और पनवेल के सिनेमाघरों में फिल्म ‘जोधा अकबर’ दिखाए जाने के दौरान हुए मामूली धमाकों की जांच की थी. उन्होंने ही इन धमाकों के तार दक्षिणपंथी संगठन सनातन संस्था से जुड़े होने का खुलासा किया था. दरअसल, करकरे को एहसास हो गया था कि ऐसी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने वाले सनातन संस्था जैसे संगठनों की साजिश गहरी है. इसलिए करकरे ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर यह जानकारी दी और सिनेमाघरों में हुए धमाकों में सनातन संस्था के शामिल होने की बात कहते हुए इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव दिया. हालांकि जब तक राज्य सरकार इस संबंध में कोई कार्रवाई करती, इसके पहले ही 26 नवंबर 2008 को मुंबई में आतंकी हमला हो गया और हेमंत करकरे समेत 3 जांबाज पुलिस अफसर इसमें शहीद हो गए.

करकरे के बाद NIA ने शुरू की थी जांच
इकोनॉमिक टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, हेमंत करकरे के शहीद होने के बाद जनवरी 2009 में एटीएस ने मकोका (MCOCA) के तहत इस धमाके के आरोपी 11 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी. इसके दो साल बाद वर्ष 2011 में मुंबई हमलों के बाद गठित की गई राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने मालेगांव धमाकों का केस अपने हाथ में ले लिया. जांच फिर से शुरू हुई लेकिन ज्यों-ज्यों समय बीता, इस केस का स्वरूप बदलने लगा. मई 2016 में एनआईए ने इस केस को लेकर सप्लीमेंट्री चार्जशीट दायर की, जिसमें बताया गया कि जांच में कुछ छूट (lacuna) गया है. एनआईए ने यह भी कहा कि इस मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत 6 अन्य लोगों के खिलाफ कोई केस नहीं बनता.

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अखबार के साथ बातचीत में मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर जूलियो रिबेरो इस मामले के लेकर कहते हैं, ‘जांच के दौरान ही हेमंत करकरे ने मुझे बताया था कि इस केस को लेकर उन पर बहुत दबाव है. धमाकों में दक्षिणपंथी संगठनों के शामिल होने की बात की जांच को लेकर करकरे के कई करीबी ही उनके खिलाफ थे. करकरे ने मुझे बताया था कि भाजपा के एक वरिष्ठ कैबिनेट मिनिस्टर ने भी उनसे इस मामले की जांच को लेकर नाखुशी जताई थी.’ जूलियो रिबेरो ने इकोनॉमिक टाइम्स के साथ बातचीत में बताया, ‘इस केस में कई हैरान करने वाली घटनाएं सामने आई हैं. सबसे पहला तो वकील का बयान, जिसमें उसने कहा कि एनआईए ने उसे केस की पड़ताल धीमा करने को कहा है. इसके बाद एनआईए का प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ कोई सबूत होने से इनकार करना, और फिर अदालत का ठाकुर पर आरोप तय करना. यह काफी हैरान कर देने वाला मामला रहा है.’