नई दिल्ली: कर्नाटक में पार्टी के ‘विजयरथ’ पर लगी लगाम और इस साल के अंत में उत्तर भारत के तीन बड़े राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में सत्ता हासिल करने के सपने के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में प्रवेश कर चुकी है, जहां कई चुनावी वादे पूरे करने के बढ़ते भार ने उनकी राजनीतिक गति को थोड़ा धीमा किया है.  राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मोदी सरकार द्वारा किए गए वादे उनकी भाषण कला के हिस्से थे और अगर भाजपा अपनी संभावनाओं में सुधार चाहती है तो उसे अगले वर्ष अधिक उदार होकर अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाने की जरूरत है. Also Read - संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा- हरियाणा सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने को BJP-JJP विधायकों पर डालें दबाव

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उन्होंने कहा कि 2019 के चुनाव के नतीजे बड़े पैमाने पर विपक्षी दलों की एकता पर निर्भर करेंगे, जो भाजपा के लिए चुनौती खड़ी करेंगे. कर्नाटक में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बावजूद सरकार नहीं बना पाने की अक्षमता पार्टी के लिए मनोबल घटाने वाली साबित हुई है. पार्टी को इस साल प्रतिष्ठित गोरखपुर और फूलपुर संसदीय उपचुनाव में भी हार का सामना करना पड़ा था. साथ-साथ राजस्थान के अजमेर और अलवर में भी भाजपा को मुंह की खानी पड़ी थी. Also Read - राजस्थान में भी लगेगा लॉकडाउन? सीएम गहलोत ने दी चेतावनी, 'कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन करें लोग, नहीं तो..'

नहीं हुआ सबका साथ, सबका विकास

राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार एच.के. दुआ ने कहा, “पिछले चार वर्षों में असहिष्णुता एक बहुत बड़ी कमी रही है.” उन्होंने कहा कि लव जिहाद और गैर कानूनी ढंग से प्राणदंड देने जैसी घटनाओं के कारण बहुलतावादी शासन प्रणाली वाले भारत की छवि को धक्का लगा है. उन्होंने कहा, “प्रत्येक घटना ने माहौल को बिगाड़ा है. भारत एक मिश्रित समाज है और प्रधानमंत्री भी खुद कह चुके हैं ‘सबका साथ, सबका विकास’ जो नहीं हुआ है. इसलिए दलित बहुत गुस्से में हैं, जनजातियां गुस्से में हैं, किसान गुस्से में हैं. जाति विभाजन पहले की तुलना में अधिक हुआ है.”

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2019 में नहीं होगी लहर

दुआ ने कहा कि संवैधानिक संस्थानों के प्रति जितना सम्मान दिखाया जाना चाहिए था, उतना नहीं दिखा. उन्होंने कहा कि संसदीय लोकतंत्र चलाने के लिए सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के बीच जो सहमति होनी चाहिए थी, उसे नजरअंदाज कर दिया गया. यह पहल प्रधानमंत्री की ओर से होनी चाहिए थी, लेकिन नहीं हुई. उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली में सरकार का कितना गहरा विश्वास है, इस पर संदेह होता है. दुआ ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि 2019 में मोदी लहर होगी. अगर विपक्ष एक हो जाता है जो वह सत्तारूढ़ दल के लिए चुनौती खड़ी कर सकता है. इसलिए एक होना बहुत बहुत जरूरी है.” दुआ ने कहा कि बतौर प्रधानमंत्री उन्हें लाल टेप काटने, महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय करने, कुछ कल्पनाशील योजनाएं शुरू करने, वितरण पर केंद्रित, सरलीकृत मानदंडों और आधिकारिक प्रशासन में सुस्ती को हटाकर निर्णय लेने में गति को बढ़ाना होगा.

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सरकारी कामकाज में सुधार की जरूरत

दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीतिक विश्लेषण पढ़ाने वाले सुब्रत मुखर्जी ने कहा कि पिछले चार वर्षो में करने के बजाय अधिक से अधिक वादे किए गए और स्टार्ट अप इंडिया व मेक इन इंडिया वो उन्नति नहीं कर पाए, जितनी उनसे उम्मीद की जा रही थी. उन्होंने कहा, “सरकार का आर्थिक रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है और वे अब हर चीज 2022 के लिए टाल रहे हैं. यह उनके शासन काल से परे है. इसलिए यह स्थगन की राजनीति है.” उन्होंने कहा कि बहुत सी योजनाएं कांग्रेस की योजनाओं का मिश्रण हैं. मुखर्जी ने कहा कि मोदी सरकार को उदार राजनीति का अभ्यास करने की जरूरत है. उन्होंने कहा, “उन्हें उदार राजनीति का अभ्यास करना होगा और नए तरीके अपनाने होंगे. अनुसूचित जाति, मुस्लिम गुस्से में हैं. अगर सत्ता में वापसी करनी है तो उन्हें कार्यप्रणाली में कारगर सुधार करना होगा.” उन्होंने कहा कि विपक्षी एकता कुशल राजनीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और बिना कांग्रेस के कोई संघीय मोर्चा नहीं खड़ा किया जा सकता. भाजपा को भी यह समझना होगा कि 2019 में गठबंधन की सरकार बनेगी, चाहे वह उसके नेतृत्व में हो या कांग्रेस के.

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विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं

वर्ष 2014 के चुनाव में मोदी दावेदार थे, लेकिन 2019 में उन्हें सत्ता बचानी है और विपक्ष के पास मुद्दों का भंडार है, जिसमें नौकरियों की कमी, बढ़ती कीमतें, किसानों की समस्या, करोड़ों रुपये के बैंक घोटाले और दलितों समेत कमजोर तबके के खिलाफ उत्पीड़न जैसे मुद्दे शामिल हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 2014 की तुलना में मोदी के अधिक कट्टर प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं और उनके हमले तीखे व कठोर हो रहे हैं. कांग्रेस महासचिव अशोक गहलोत ने कहा कि लोगों ने मोदी पर भरोसा किया था, लेकिन उन्होंने उन्हें धोखा दिया. विपक्ष का सदस्य होने के नाते, वह सरकार की चौतरफा विफलता देखते हैं. उन्होंने कहा, “किसान, युवा, व्यापारी, महिलाएं सभी खुद को धोखे का शिकार महसूस कर रहे हैं. लोगों के बीच डर और संदेह का माहौल है. तेल के दाम आसमान छू रहे हैं. लूट मची हुई है. देश के हालात और समाज के सभी वर्ग दुखी हैं, लोग देश की सभी पार्टियों को साथ आकर मोदी और भाजपा को हराने के लिए मजबूर करेंगे.”

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भाजपा का दावा, बुनियादी जरूरतें पूरी हुईं

भाजपा प्रवक्ता जी.वी.एल. नरसिम्हा राव ने हालांकि उम्मीद के मुताबिक, पिछले चार वर्षो को महत्वपूर्ण करार दिया. राव ने कहा, “इन चार वर्षों को भ्रष्टाचार मुक्त शासन के साथ नए भारत युग में प्रवेश, किसानों, महिलाओं और हाशिए वाले वर्गों पर विशेष ध्यान देने के साथ-साथ समावेशी आर्थिक विकास के लिए याद किया जाएगा.” उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने उज्‍जवला जैसी अभिनव योजनाओं के साथ आम जनता की लंबे समय से नजरअंदाज की जा रही बुनियादी जरूरतों को पूरा किया है.

इस साल के अंत में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने हैं और इसे लोकसभा चुनाव के लिए सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा है. इन तीनों राज्यों में भाजपा सत्ता में हैं, जहां उसे कड़ा मुकाबला मिलने की उम्मीद है.