A Certificate Alone Wont Make A Man And His Wife A Marriage Certificate Without Rituals Is Useless
सिर्फ सर्टिफिकेट से नहीं बनेंगे पति-पत्नी, बिना रस्मों के मैरिज सर्टिफिकेट बेकार.. पढ़िए सुप्रीम कोर्ट फैसला
यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण है जहां लोग वीजा, अन्य लाभ या सुविधा के लिए सिर्फ रजिस्ट्रेशन करा लेते हैं, लेकिन रस्में नहीं निभाते. कोर्ट ने युवाओं से अपील की कि वे शादी की पवित्रता पर गहराई से विचार करें. यह हिंदू विवाह की सांस्कृतिक और कानूनी गरिमा को मजबूत करता है.
सुप्रीम कोर्ट ने 19 अप्रैल 2024 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें स्पष्ट किया गया कि हिंदू रीति-रिवाज से की गई शादी में आवश्यक रस्में और संस्कार (ceremonies) न होने पर शादी का सर्टिफिकेट या रजिस्ट्रेशन शादी को वैध नहीं बना सकता. कोर्ट ने कहा कि हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के तहत शादी एक पवित्र संस्कार (samskara) है, न कि सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट या सामाजिक आयोजन. बिना रस्मों के सिर्फ रजिस्ट्रेशन से पति-पत्नी का दर्जा नहीं मिलता.
कब आया था ये फैसला
यह फैसला डॉली रानी बनाम मनीष कुमार चंचल मामले में आया. दोनों पक्ष (पिटीशनर महिला और रिस्पॉन्डेंट पुरुष) कमर्शियल पायलट थे. उनकी सगाई 7 मार्च 2021 को हुई थी. पारंपरिक हिंदू रस्मों से शादी करने के बजाय उन्होंने 7 जुलाई 2021 को एक प्राइवेट संगठन वादिक जनकल्याण समिति (रजि.) से मैरिज सर्टिफिकेट लिया. इसके आधार पर उत्तर प्रदेश के नियमों के तहत मैरिज रजिस्ट्रेशन भी करा लिया. बाद में संबंध बिगड़ने पर रिस्पॉन्डेंट ने बिहार के मुजफ्फरपुर फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दाखिल की.
सर्टिफिकेट के दबाव में रजिस्ट्रेशन
पिटीशनर ने सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर पिटीशन दाखिल की, जिसमें दोनों पक्षों ने संयुक्त रूप से कहा कि कोई वैध हिंदू शादी नहीं हुई थी. उन्होंने कोर्ट को बताया कि कोई भी हिंदू रस्में (जैसे सप्तपदी – पवित्र अग्नि के सामने सात फेरे) नहीं हुईं. दोनों ने स्वीकार किया कि सिर्फ सर्टिफिकेट के दबाव में रजिस्ट्रेशन कराया गया था.जस्टिस बी.वी. नागरथ्ना और जस्टिस अगस्टाइन जॉर्ज मसीह की बेंच ने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 7 का हवाला दिया, जो कहती है कि हिंदू शादी तब वैध होती है जब पक्षकारों के रीति-रिवाज के अनुसार आवश्यक रस्में पूरी की जाती हैं. अगर सप्तपदी जैसे रस्म शामिल हैं, तो उनका पालन जरूरी है. कोर्ट ने कहा, “Unless and until the marriage is performed with appropriate ceremonies and in due form, it cannot be said to be ‘solemnized’.” यानी बिना रस्मों के शादी को ‘solemnized’ नहीं माना जा सकता.
समाज में परिवार की बुनियाद
कोर्ट ने आगे कहा कि हिंदू शादी “song and dance”, “wining and dining” या कमर्शियल ट्रांजेक्शन नहीं है. यह भारतीय समाज में परिवार की बुनियाद और पवित्र संस्था है, जो जीवनभर की गरिमापूर्ण, समान, सहमति वाली और स्वस्थ साझेदारी प्रदान करती है. स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन से शादी वैध हो सकती है, लेकिन हिंदू मैरिज एक्ट में रस्में अनिवार्य हैं.
धारा 8 के तहत रजिस्ट्रेशन सिर्फ शादी के सबूत (proof of factum) के लिए है, न कि शादी बनाने के लिए. अगर धारा 7 के अनुसार रस्में नहीं हुईं, तो रजिस्ट्रेशन से कोई वैधता नहीं मिलती. कोर्ट ने आर्टिकल 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल कर घोषित किया कि दोनों के बीच कोई हिंदू शादी नहीं हुई. वादिक जनकल्याण समिति का सर्टिफिकेट और उत्तर प्रदेश रजिस्ट्रेशन दोनों को नल एंड वॉइड घोषित किया गया. दोनों कभी पति-पत्नी नहीं बने.
ब्रेकिंग न्यूज और लाइव न्यूज अपडेट के लिए हमें फेसबुक पर लाइक करें या ट्विटर पर फॉलो करें. India.Com पर विस्तार से पढ़ें India Hindi की और अन्य ताजा-तरीन खबरें
By clicking “Accept All Cookies”, you agree to the storing of cookies on your device to enhance site navigation, analyze site usage, and assist in our marketing efforts Cookies Policy.