नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में गुरुवार को एडल्टरी यानी विवाहेतर संबंध को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया है. शीर्ष अदालत ने IPC की धारा 497 में अडल्टरी को अपराध बताने वाले प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया.गुरुवार को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए.एम. खानविलकर, जस्टिस इंदु मल्होत्रा, जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस आरएफ नरीमन की पांच जजों की बेंच ने एकमत से यह फैसला सुनाया. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि IPC की धारा सेक्शन 497 महिला के सम्मान के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि महिलाओं को हमेशा समान अधिकार मिलना चाहिए. चीफ जस्टिस ने कहा कि पति कभी भी पत्नी का मालिक नहीं हो सकता है.

10 अक्टूबर, 2017 को केरल के एनआरआई जोसेफ शाइन ने कोर्ट में याचिका दायर कर आईपीसी की धारा 497 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी. याचिका में शाइन ने कहा कि पहली नजर में धारा 497 असंवैधानिक है क्योंकि वह पुरुषों और महिलाओं में भेदभाव करता है तथा संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करता है. आठ दिसंबर, 2017 को कोर्ट ने ने व्यभिचार से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करने पर हामी भरी. पांच जनवरी, 2018 को न्यायालय ने व्यभिचार से जुड़े दंडात्मक कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजा. केंद्र सरकार ने 11 जुलाई, 2018 को कोर्ट में दलील दी कि धारा 497 को निरस्त करने से वैवाहित संस्था नष्ट हो जाएगी

एक अगस्त को संविधान पीठ ने मामले की सुनवाई शुरू की. दो अगस्त को न्यायालय ने कहा कि वैवाहिक पवित्रता एक मुद्दा है, लेकिन व्यभिचार के लिए दंडात्मक प्रावधान अंतत: संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है. आठ अगस्त को केन्द्र ने व्यभिचार के संबंध में दंडात्मक कानून बनाए रखने का समर्थन किया, कहा कि यह सामाजिक तौर पर गलत है और इससे जीवनसाथी, बच्चे और परिवार मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित होते हैं. आठ अगस्त को न्यायालय ने छह दिन तक चली सुनवाई के बाद व्यभिचार संबंधी दंडात्मक प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया. 27 सितंबर, 2018 यानी आज न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक बताते हुए इस दंडात्मक प्रावधान को निरस्त किया.

अब तक क्या था कानून
IPC की धारा 497 के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले तक अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी और शादीशुदा महिला के साथ सहमति से संबंध बनाता है, तो पुरुष के खिलाफ अडल्टरी का केस दर्ज हो सकता था, लेकिन संबंध बनाने वाली महिला के खिलाफ केस नहीं हो सकता था. आईपीसी की धारा 497 कहती थी कि जो भी कोई ऐसी महिला के साथ, जो किसी अन्य पुरुष की पत्नी है और जिसका किसी अन्य पुरुष की पत्नी होना वह विश्वास पूर्वक जानता है, बिना उसके पति की सहमति या उपेक्षा के शारीरिक संबंध बनाता है जो तो बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आता, वह व्यभिचार के अपराध का दोषी होगा, और उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा जिसे पांच वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है या आर्थिक दंड या दोनों से दंडित किया जाएगा. ऐसे मामले में पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं होगी.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता केरल के एनआरआई जोसेफ शाइन के वकील कालीश्वरम राज ने कहा था कि वह आईपीसी की धारा 497 और सीआरपीसी की धारा 198 (2) को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं. शाइन एक भारतीय हैं, जो इटली में रह रहे हैं. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा सिर्फ महिला के पति को शिकायत दायर करने की अनुमति देती है.उन्होंने कहा कि वे इस आधार पर इस प्रावधान को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं कि यह लैंगिक तटस्थ नहीं है और निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हैं. पीठ के समक्ष सवाल यह था कि क्या किसी व्यक्ति को इस आधार पर जेल भेजा जा सकता है कि उसका किसी विवाहित महिला के साथ यौन संबंध में था.