एक जादूगर का बेटा जो छात्रसंघ का चुनाव बुरी तरह हार चुका हो, आज कांग्रेस अध्यक्ष का सेनापति है. राहुल गांधी को जिस शख्स ने बचपन में जादू दिखाया था, आज वही एक ऐसे समय में उनकी पार्टी के संगठन का नेतृत्व कर रहा है जब ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा लग रहा हो. ये शख्स सबका ”भाई” बनता है और अपने सियासी पैंतरेबाजी से उस राज्य का सीएम बनता है, जहां क्षत्रियों, जाटों और ब्राह्मणों का वर्चस्व रहता आया है. कभी डॉक्टर बनने का सपना देखने वाला यह शख्स आज कांग्रेस के एक बुरे दौर में उसका इलाज कर रहा है. पारले जी बिस्कुट के शौकीन इस नेता पर अब अपने ‘जिनियस’ स्ट्रेटजी से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ बने परसेप्शन को तोड़ने की जिम्मेदारी है. हम बात कर रहे हैं राजस्थान के दो बार सीएम रह चुके और वर्तमान में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत की.

राजस्थान चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस की नाव के खेवनहार अशोक गहलोत हैं. हालांकि, इस बार उन्हें सचिन पायलट के रूप में एक मजबूत साथी मिला है. गहलोत की राज्य में एक ऐसे नेता की छवि है, जो बोलता कम है और रिजल्ट देने में ज्यादा विश्वास करता है. सादगी, विनम्रता, गरीबों की रहनुमाई और पार्टी के प्रति वफादारी उनकी पूंजी है. जो जितना जनता का आदमी है उतना ही संगठन पर भी मजबूत पकड़ रखता है. वह सिर्फ सड़क की कड़क चाय पीने का शौकीन नहीं है, बल्कि जनता के हितों में हो या फिर पार्टी में संगठनात्मक मजबूती की बात हो, कड़क फैसला भी लेता है.

सादगी की चर्चा
महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग और कबीर से प्रेरित गहलोत की सादगी के कई किस्से हैं. साल 1980 में पहली बार सांसद बने गहलोत जब साल 1982 में दिल्ली में राज्य मंत्री पद की शपथ लेने तिपहिया ऑटोरिक्शा से राष्ट्रपति भवन पहुंचे तो वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोक लिया था. हमेशा सूत की माला पहनने वाले गहलोत ने अपने साथियों की तरफ से मिलने वाले बुके पर इसे ”फिजूल का खर्च” बता आपत्ति जता चुके हैं. उनके समर्थक याद दिलाते हैं कैसे उन्होंने अपनी बेटी सोनिया की शादी सादगी से की थी और बारात को छ़ोडने के लिए रेलवे स्टेशन गए तो एक-एक मेहमान की गिनती कर प्लेटफॉर्म टिकट खरीदे थे. हालांकि, उनके विरोधी हमेशा से कहते आए हैं कि गहलोत हर चीज में एक मैसेज देने की राजनीति करते हैं और यही उनकी सियासी पैंतरेबाजी भी है.

क्या देखते हुए मिली कांग्रेस संगठन की जिम्मेदारी
पिछले साल राहुल गांधी जब कांग्रेस अध्यक्ष बने तो ये कयास लगाए जाने लगे कि पार्टी के संगठन में भी बड़ा उलटफेर हो सकता है. इसके बाद कांग्रेस पार्टी में एक बड़ा परिवर्तन हुआ और सोनिया गांधी के करीबी जनार्दन द्विवेदी की पार्टी महासचिव पद से छुट्टी करते हुए अशोक गहलोत को संगठन के मामलों की कमान सौंपी गई. इसके पीछे ये तर्क दिया गया कि जिस तरह पार्टी महासचिव रहते हुए राहुल गांधी कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस की रूप-रेखा बनाने का काम करते थे, उसी तरह 70 के दशक में गहलोत राजस्थान में एनएसयूआई की जिम्मेदारी निभाते थे. संगठन को मजबूत करने की उनकी इस काबिलियत ने ही उन्हें राहुल गांधी के करीब लाया. कहा जाता है कि एनएसयूआई से लेकर राजस्थान कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनने तक गहलोत ने संगठन और प्रदेश में अपनी इस तरह मजबूत पकड़ बनाई कि हर विधानसभा में 2 से 5 हजार तक उनके अपने समर्थक हैं. पार्टी महासचिव की जिम्मेदारी मिलने के बाद उन्होंने जिस तरह गुजरात में काम किया और रक्षाबंधन से लेकर दिवाली तक के ऐसे त्योहार जिसमें वह राजस्थान में मौजूद ही रहते थे, उसमें भी वह गुजरात में ही डेरा डाले रहे. उन्होंने डोर टू डोर प्रचार भी किया. शायद उनकी इसी शैली की वजह से उन्हें कार्यकर्ताओं का नेता और नेताओं में कार्यकर्ता कहा जाता है.
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किस तरह कांग्रेस में बढ़ा ग्राफ
जोधपुर में जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव से निकले गहलोत ने युवावस्था में ही खुद को समाजिक सेवा कार्यों में लगा दिया. वह जोधपुर के अस्पतालों में भर्ती मरीजों को संभालते ही नहीं थे, बल्कि दूर दराज के गावों से आकर भर्ती मरीजों से मिलकर उनके गांव-परिजनों को चिट्ठियां भी लिखते थे. इसी दौरान वह तरुण शांति सेना से जुड़ गए और शराब की दुकानों के विरोध में आंदोलन खड़ा कर दिए. साल 1970 में पूर्वी बंगाल के शरणार्थी शिविरों में उनके काम की काफी चर्चा हुई और बस इसी समय कांग्रेस की उनपर नजर पड़ी. उन्हें राजस्थान में भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) का अध्यक्ष बना दिया गया.

मोटरसाइकिल बेच पैसे जुटा सांसदी का चुनाव लड़ने उतरे
साल 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति काफी खराब थी. हालात यह थे कि उनकी सीट से कांग्रेस से टिकट लेने कोई कद्दावर नेता नहीं आगे आ रहा था. ऐसे में अशोक गहलोत को पार्टी ने टिकट दिया. गहलोत के पास पैसे नहीं थे और उन्होंने 4 हजार रुपये में अपनी बाइक बेचकर चुनाव लड़ा. अपने दोस्त के सैलून को उन्होंने चुनाव कार्यालय बनवाया था और दोस्त की बाइक पर घूमकर प्रचार करते थे. गहलोत खुद पोस्टर तक चिपकाते थे. इसके बाद रिजल्ट आए तो गहलोत देश के युवा सांसद के रूप में सामने आए. गहलोत भविष्य का अनुमान लगाने की समझ रखते हैं और सत्ता में आते हैं तो शक्ति का केन्द्रीयकरण कर लेते हैं.

जोधपुर को चिड़ियानाथ के श्राप से मुक्त कराया
हर गांव-कस्बे-शहर की तरह जोधपुर में भी एक कहानी काफी प्रचलित है. कहा जाता है कि एक बाबा चिड़ियानाथ ने जोधपुर को श्राप दिया था कि यहां कभी पानी नहीं होगा. हमेशा अकाल की स्थिति रहेगी. लेकिन, गहलोत ने इस पूरी कहानी को बदल दिया. अपने सांसदी कार्यकाल के दौरान ही वह वहां लिफ्ट कैनाल लाने में सफल रहे और आज जोधपुर के लोगों को पानी के संकट से उबार दिया.

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घर के कमरे से खास लगाव
जोधपुर में ही गहलोत का एक पुस्तैनी घर है. वहां उनके भाई अग्रसेन रहते थे. हाल ही में उनका निधन हो गया है. इस पुस्तैनी घर के एक कमरे से गहलोत का पुराना रिश्ता है. कहा जाता है कि गहलोत इसे अपने लिए लकी मानते हैं. वह हर बार मतदान से पहले इस कमरे में रुकते हैं और यहीं से मतदान करने जाते हैं.

जातिवाद के खिलाफ मुहिम
राजस्थान की राजनीति में शुरू से ही क्षत्रियों, जाटों और ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा है. ऐसे में मालि जाति से ताल्लुक रखने वाले गहलोत ने जातिवाद के खिलाफ मुहिम छेड़ दिया. यह वह दौर था जब लोग उन्हें अशोग गहलोत नहीं अशोक भाई कहकर पुकारते थे. लेकिन बाद में वह फिर अशोक गहलोत हुए तो विपक्षियों ने इसपर सवाल उठाया. गहलोत ने इसपर भी करीने से जवाब दिया था कि कुछ लोग सोचते हैं कि मैं यह सब सीएम बनने के लिए कर रहा हूं, इसीलिए हटा लिया.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत
साल 1998 में जब अशोक गहलोत पहली बार मुख्यमंत्री बने तो प्रदेश में जाट और ब्राह्मण नेताओं का बोलबाला था. पूरे सूबे की सियासत भैरो सिंह शेखावत के इर्द-गिर्द घुमती थी. लेकिन जमीन पर मजबूत पकड़ और हर विधानसभा में 2 से 5 हजार के समर्थकों के बल पर गहलोत ने ये बाजी पलटी थी. वह कहते हैं कि राज्य का कोना-कोना, हर गांव, हर ढाणी उनके दिल में बसा है और वह सबपर नजर बनाए रहते हैं. अशोक गहलोत ने संगठन में ‘टिफिन गोठ’ परंपरा की शुरुआत की थी. यह आज भी कायम है और कांग्रेस कार्यकर्ता टिफिन लेकर आते हैं और कार्यकर्ता-नेता मिलकर खाना खाते है. उन्होंने ये परंपरा बराबरी का दर्जा देने के लिए शुरू किया था. गहलोत का ये कार्यकाल मुफ्त दवा योजना और अकाल राहत के बेहतर प्रबंधन के लिए याद किया जाता है.

व्यक्तिगत जीवन
3 मई 1951 को जोधपुर में जन्मे अशोक गहलोत साइंस और लॉ ग्रेजुएट हैं. उन्होंने इकॉनमिक्स में मास्टर डिग्री भी ली है. उनके पिता लक्ष्मण सिंह जादूगर थे, जो उन्हें विरासत में मिली थी. लक्ष्मण सिंह महामंदिर के 4 बार पार्षद रहे और जोधपुर नगर पालिका 3 बार अध्यक्ष भी रहे. अशोक कॉलेज से निकले तो रोजगार एक चुनौती थी. साल 1972 में उन्होंने जोधपुर से पचास किलोमीटर दूर पीपाड़ कस्बे में खाद-बीज की दुकान खोली, जोकि चल नहीं पाई. डेढ़ साल में ही कारोबार बंद हो गया. पिता से जादू का पेशा सीख गहलोत ने कुछ वक्त तक इसमें भी हाथ आजमाया. लेकिन नियति ने उन्हें राजनीति के मैदान में उतारा और जनता के बीच उनका जादू चलने लगा.

गहलोत पर बीजेपी ने लगाए हैं कई आरोप
अशोक गहलोत के अंतिम दिनों में उन्हें बीजेपी ने उनके पेटे वैभव गहलोत को लेकर घेरा था. बीजेपी ने आरोप लगाया कि गहलोत की सरकार ने ऐसी दो कंपनियों को 800 करोड़ रुपये का फायदा पहुंचाया, जिसके लीगल एडवाइजर वैभव हैं. दूसरी तरफ गहलोत पर उदयसागर झील (उदयपुर) फाइव स्टार होटल का दो हजार करोड़ रुपए का घोटाला, कल्पतरू कंपनी के माध्यम से राजस्थान वेयर हाउसिंग कार्पोरेशन में किया करोड़ों रुपए का घोटाला, गहलोत खानदान को जोधपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पदों पर फर्जी नियुक्ति घोटाला, खान आवंटन सूची में गहलोत के रिश्तेदारों के नाम आदि कई घोटाले के आरोप लगाए गए. बीजेपी ने कहा कि भ्रष्टाचार का सीधा कनेक्शन भाई-भतीजावाद से है और रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाया गया है.