नई दिल्ली. आपने एक लोकोक्ति सुनी होगी- ‘कोस कोस पर बदले वाणी, चार कोस पर पानी’. एक राजनेता अपने चुनावी समीकरण को सेट करने और जनता से करीबी रिश्ता बनाने के लिए इसका भरपूर इस्तेमाल करती हैं. उनका जन्म मुंबई में होता है, रहने वाली ग्वालियर राजघराने की हैं, लेकिन राजस्थान जैसे प्रदेश की महिला मुख्यमंत्री बनती हैं. एक ऐसा प्रदेश जहां की राजनीति तीन मुख्य जातियों के इर्दगिर्द घुमती है, वहां वह खुद को राजपूतों की बेटी, जाटों की बहू और गुर्जरों की समधन बताती हैं. जहां मध्यप्रदेश में कांग्रेस का एक बड़ा नेता पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर कहता है कि वह महाराजा नहीं, बल्कि आम इंसान है, वहीं इस महिला को पूरा राजस्थान ‘महारानी’ कहता है और वह इसे बखूबी स्वीकार भी करती हैं. तेवर ऐसा है कि चाहे लोकसभा चुनाव 2014 हो या 2018 का विधानसभा, टिकट वितरण से पहले इस तरह की खबरें आती हैं कि दिल्ली का नेतृत्व ‘महारानी’ के आगे फिर अपनी दाल नहीं गला पाया. हम बात कर रहे हैं राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया की. Also Read - लोकसभा चुनाव चौथा चरणः रेखा, माधुरी, आमिर, अनिल अंबानी समेत तमाम हस्तियों ने डाले वोट, देखें PHOTOS

महारानी की शख्सियत के लिए दो उदाहरण
राजस्थान चुनाव में बीजेपी एक बार फिर वसुंधरा राजे को सामने करके चुनाव में उतरी है. वसुंधरा के पावर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2012 में बीजेपी नेता राजेंद्र राठौड़ ने कहा था, ‘राजस्थान में वसुंधरा ही बीजेपी हैं और बीजेपी ही वसुंधरा’. यह बयान उसी तरह चर्चित हुआ जैसे कांग्रेस नेता देवकांत बरुआ का बयान, ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’. पार्टी के लोग ही नहीं कांग्रेस नेता और इस समय कांग्रेस सीएम कैंडिडेट के तौर पर देखे जा रहे सचिन पायलट ने एक कार्यक्रम में कहा, ‘जो काम बीजेपी में पूरे देश का कोई नेता नहीं कर सका, उसे वसुंधरा राजे ने कर दिखाया. उन्होंने अमित शाह को उनकी जगह दिखाई.’ पायलट के इस बयान के कई मतलब निकाले गए, लेकिन जो बात साबित होती है वह है महारानी की मजबूत शख्सियत. जैसे तमिलनाडु में ‘अम्मा’, पश्चिम बंगाल में ‘दीदी’ या फिर एक दौर में उत्तर प्रदेश में ‘बहनजी’ थीं, अपनी राजनीतिक कुशलता और अक्खड़पन से राजस्थान में ‘महारानी’ अपनी छवि बनाते हुए दिखती हैं. Also Read - गहलोत ने किसानों को दी सौगात, 5 साल नहीं बढेंगे बिजली के दाम

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पॉलिटिक्स क्या है
वसुंधरा राजे की पहली पहचान उनकी मां विजया राजे सिंधिया से है. वह भारतीय जनसंघ की संस्थापक सदस्यों में से एक थीं. मां से मिली विरासत को वसुंधरा ने आगे बढ़ाया और सबको साधते हुए यहां तक का सफर तय किया. बचपन से सामाजिक कार्य में रुचि रखने वाली वसुंधरा राजे बीजेपी से जुड़ गईं और साल 1984 में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल हुईं. वसुंधरा ने अपना पहला चुनाव मध्य प्रदेश के भिंड लोकसभा सीट से लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा. वसुंधरा हार मानने वाली नहीं थी. एक तरफ पति से अलगाव और दूसरी तरफ राजनीति में संघर्ष करते हुए वह राजस्थान की राजनीति में उतर गईं और साल 1985 में धौलपुर विधानसभा सीट से सदन में पहुंचीं. इस जीत ने उनका राजनैतिक ग्राफ जो बढ़ाना शुरू किया वह आज तक जारी है. साल 1987 में वसुंधरा राजस्थान बीजेपी की उपाध्यक्ष बनीं, तो साल 1998-1999 में अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में विदेश राज्यमंत्री. दिसंबर 2003 में वह राजस्थान की मुख्यमंत्री बनीं.

जैसा देश, वैसा भेस
‘जैसा देश, वैसा भेस’ जैसी लोकोक्ति भी भारत में खूब चलती है. वसुंधरा इसका बखूबी प्रयोग करती हैं. अपनी यात्रा में वे हनुमानगढ़-गंगानगर जिलों में पहुंचती हैं तो सरदारनी वसुंधरा राजे बन जाती हैं. नोहर-भादरा में पहुंचती हैं तो चौधरी वसुंधरा राजे बन जाती हैं और राजपूत बेल्ट में वे महारानी कहलाई जाती हैं. इतना ही नहीं आदिवासियों में वे ठेठ आदिवासी की तरह नजर आती हैं. वसुंधरा महिलाओं को लुभाने के लिए जिस इलाके में जातीं उसी इलाके की वेशभूषा पहनकर जाती थीं.

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राजनैतिक समीकरण
विरसात में मिली राजनीति में भी वसुंधरा के सामने कई चुनौतियां थीं. एक तो पार्टी में भैरो सिंह शेखावत से लेकर घनश्याम तिवाड़ी, ओम माथुर और रामदास अग्रवाल, ओम माथुर तक बीजेपी में अपनी मजबूत पकड़ के लिए जाने जाते हैं, लेकिन अपने अक्खड़ तेवर और मजबूत प्रशासनिक छवि के साथ-साथ सबको साधने की कला की बदौलत ‘महारानी’ आगे बढ़ती गईं. वह मध्य प्रदेश के ग्वालियर राजघराने से हैं, ऐसे में वह एक वर्ग से कहती हैं, ‘मैं राजपूत की बेटी हूं’. उनकी शादी राजस्थान के एक जाट राजघराने में हुई. ऐसे में वह कहती हैं, ‘मैं जाटों की बहू हूं.’ इतना ही नहीं, उनके बेटे दुष्यंत सिंह गुर्जर घराने में ब्याहे हैं इसलिए वो कहती हैं, ‘मैं गुर्जरों की समधन हूं.’ हर वर्ग को साधने की उनकी यह कला ही उन्हें सबसे अलग करती है.

राजनैतिक ग्रोथ
वसुंधरा राजे साल 1984 में बीजेपी की राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल हुईं. साल 1987 में वसुंधरा राजे राजस्थान प्रदेश भाजपा की उपाध्यक्ष बनीं और 1998-1999 में अटलबिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में विदेश राज्यमंत्री बनीं. भैरों सिंह शेखावत के उपराष्ट्रपति बनने के बाद वसुंधरा राजस्थान बीजेपी की अध्यक्ष बनीं. आठ दिसम्बर 2003 को वसुंधरा राजे प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं. वह साल 1985-90, 2003-08, 2008-13 और 2013 में विधायक बनीं. वह साल 1989-91, 1991-96, 1996-98, 1998-99 और 1999-03 तक सांसद रहीं.

शुरुआती जीवन
वसुंधरा राजे सिंधिया का जन्म 8 मार्च 1953 को मुंबई में हुआ. वह मध्यप्रदेश के ग्वालियर राजघराने से हैं. उनकी मां विजया राजे सिंधिया जहां जनसंघ के दौर से उससे जड़ी रहीं, वहीं उनके भाई माधव राव सिंधया कांग्रेस के बड़े नेता. उनकी शुरुआती पढ़ाई प्रेजेंटेशन कॉन्वेंट स्कूल में हुई. इसके बाद वह सोफिया महाविद्यालय, मुंबई यूनिवर्सिटी से इकॉनॉमिक्स और साइंस ऑनर्स से ग्रेजुएट हुईं. 20 साल की उम्र में उनकी शादी राजस्थान के धौलपुर में जाट राजघराने में हेमंत सिंह से हुई. हालांकि, बेटे दुष्यंट के जन्म के बाद साल 1975 में वह पति से अलग हो गईं.

वसुंधरा पर आरोप
सचिन पायलट ने वसुंधर पर हाल ही में जनता के टैक्स के पैसे के दुरुपयोग का आरोप लगाया है. उन्होंने पीडब्ल्यूडी विभाग के डेटा का हवाला देते हुए कहा कि टैक्स के पैसे से वह यात्रा निकाल रही हैं. ललित मोदी से कनेक्शन के मुद्दे पर भी कांग्रेस ने वसुंधरा और उनके सासंद बेटे दुष्यंत को घेरा है तो दूसरी तरफ सरकारी जमीन के बदले में लोगों से मुआवजा लेने का दुष्यंत पर आरोप लगाया है.