नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार की ओर से लाए गए एससी/एसटी कानून को लेकर कुछ सवर्ण संगठनों की ओर से गुरुवार को ‘भारत बंद’ बुलाया गया है. मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान सहित कई प्रदेशों में इसका व्यापक असर देखने को मिल रहा है. बिहार में कई जगह ट्रेन रोकी गई है तो देश के कई राज्यों में सड़क पर प्रदर्शन हुआ है. मध्य प्रदेश में स्कूल-कॉलेज बंद हैं तो कई जिले में धारा 144 लागू है. राजस्थान और उत्तर प्रदेश के भी कई जिले में अलर्ट जारी किया गया है. जानिए क्या है SC/ST एक्ट, सुप्रीम कोर्ट का फैसला और सरकार का रुख क्या रहा है…सवर्णों की मांग क्या है… Also Read - कोरोना के कारण मजदूरों का पलायन: कोर्ट ने तलब की रिपोर्ट, डर दहशत को बताया वायरस से भी बड़ी समस्या

एससी/एसटी एक्ट
अनुसूचित जाति (Scheduled caste ‘SC’) और अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe ‘ST’) के लोगों, दलित, वंचित और हाशिए पर खड़े समुदाय को न्याय दिलाने और भेदभाव को रोकने के मकसद से एससी/एसटी (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989 बनाया गया था. इसका उद्देश्य इनके खिलाफ होने वाले अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष व्यवस्था बनाना है, जिससे ये समाज भय और हिंसा मुक्त वातावरण में मौलिक अधिकारों के साथ जी सके और अपनी बात रख सके. इसके बाद इसे जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू किया गया. Also Read - सात महीने की हिरासत के बाद रिहा होंगे उमर अब्दुल्ला, जम्मू-कश्मीर सरकार ने जारी किए आदेश

तुरंत होती है गिरफ्तारी
एससी/एसटी समुदाय का कोई व्यक्ति किसी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराता है तो आरोपी के खिलाफ तुरंत प्राथमिकी दर्ज हो जाती है. बिना जांच के उस व्यक्ति को तत्काल गिरफ्तार किया जाता है. मामलों की सुनवाई भी स्पेशल कोर्ट में होती है साथ ही अग्रिम जमानत मिलने का भी प्रावधान नहीं है. इसमें जमानत केवल हाईकोर्ट से मिलती है.
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सुप्रीम कोर्ट का रुख
20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट के दुरुपयोग को लेकर चिंता जताई. कोर्ट ने इस एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी की व्यवस्था पर रोक लगा दी. कोर्ट ने कहा कि शिकायत मिलने पर तुरंत मुकदमा भी दर्ज नहीं किया जाएगा. मुकदमे के लिए पहले डीएसपी स्तर के पुलिस अफसर द्वारा 7 दिन के अंदर शुरुआती जांच की जाएगी. कोर्ट ने गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत का भी प्रावधान किया.

दलित समुदाय ने किया प्रदर्शन
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद दलित समुदाय ने प्रदर्शन शुरू कर दिया. देश के कई हिस्से में बंद बुलाया गया और प्रदर्शन हुए. इसमें 10 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई. एनडीए में शामिल कई पार्टियों ने भी नाराजगी जताई. यहां तक की कई दलित बीजेपी सांसदों ने भी इसपर सख्त प्रतिक्रिया दी.

सरकार का रुख
इस मुद्दे पर विवाद बढ़ता देख और मामले की संवेदनशीलता को देख केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई और फैसले पर पुनर्विचार दाखिल किया. लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने ये कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया कि कोर्ट ने किसी भी तरीके से इस कानून को कमजोर नहीं किया है.

सरकार का अगला स्टेप
इस मुद्दे पर दलित संगठनों के प्रदर्शन और एनडीए के घटक दलों के नेताओं की नाराजगी को देखते हुए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने का निर्णय लिया. मानसून सत्र में सरकार ने एससी-एसटी एक्ट में संसोधन संबंधित विधेयक को मंजूरी दे दी. इससे पुरानी व्यवस्था एक बार फिर लागू हो गई, जिसमें तुरंत गिरफ्तारी और गैर जमानती वारंट का प्रावधान था. मूल कानून में धारा 18 ए जोड़ दिया गया और कोर्ट के प्रावधान रद्द करने की बात कही गई. साथ ही मामले की जांच इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अफसर करेंगे और सुनवाई सिर्फ स्पेशल कोर्ट में होगी. साथ ही सरकारी कर्मचारी के खिलाफ चार्जशीट दायर करने से पहले जांच एजेंसी को अथॉरिटी से इजाजत नहीं लेनी होगी.

सवर्ण समुदाय की मांग
सवर्ण समुदाय की नाराजगी सरकार के स्टेप से हैं. उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही था. उनका कहना है कि इस एक्ट का काफी दुरुपयोग हो रहा था और ज्यादातर मामले झूठे निकल रहे थे. इसमें जानबूझकर फंसाने का मामला सामने आ रहा था. वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बहाल करने की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि वोट बैंक के दबाव में आकर सरकार ने इसमें बदलाव किया है.