नई दिल्ली. सबरीमाला में भगवान अयप्पा का मंदिर आज 5 नवंबर को एक दिन के लिए पूजा के लिए खुलेगा. सबरीमला मंदिर में 10-50 आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ पिछले महीने हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए शनिवार की रात से ही मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है. पंबा, नीलक्कल और इलुवांगल में चार या इससे अधिक लोगों के जुटने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश देते हुए महिलाओं के लिए सबरीमला के दरवाजे खुलवा दिए थे, जिसके बाद से पक्ष और विपक्ष में लोग खुलकर खड़े हो गए हैं.

बता दें कि इससे पहले मंदिर को 17-22 अक्टूबर तक पांच दिन तक चलने वाली मासिक पूजा के लिए खोला गया था. उस दौरान प्रतिबंधित आयु वर्ग की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के खिलाफ श्रद्धालुओं और अन्य संगठनों का विरोध प्रदर्शन देखा गया था. तकरीबन एक दर्जन युवा महिलाओं ने प्रार्थना करने का असफल प्रयास किया था. इस दौरान उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा था. मान्यताओं के आगे कानून की नहीं चली और एक भी महिला अभी तक मंदिर में एंट्री नहीं कर पाई है. आइए जानते हैं कि इस मंदिर में ऐसा क्या है कि सिर्फ पुरुष ही इस मंदिर में पूजा कर सकते हैं. महिलाओं का प्रवेश क्यों वर्जित है…

मान्यता
कंब रामायण, महाभागवत के अष्टम स्कंद और स्कंद पुराण में शिशु शास्ता के बारे में लिखा है, जिन्हें मोहिनी और शिव का बेटा कहा जाता है. कहा जाता है कि अयप्पा उन्हीं के अवतार हैं. इन्हें हरिहरपुत्र, अयप्पन, शास्ता, मणिकांता नाम से भी जाना जाता है.

कब होते हैं दर्शन
मंडल काल या मंडल मासम 41 दिनों का होता है. इस दौरान भक्त कठिन व्रत का पालन करते हैं. मंडल काल के बाद के बाद मंदिर को 3 दिनों के लिए बंद कर दिया जाता है. इसके बाद इसे चौथे दिन दर्शन के लिए खोला जाता है. श्रद्धालुओं के मंदिर सिर्फ नवंबर से जनवरी में पड़ने वाले मकरसंक्रांति तक खुलता है.

घने जंगल मैं है मंदिर
सबरीमाला का मंदिर केरल के तिरुवनंतपुरम से करीब 175 किमी दूर पत्तनमत्तिट्टा जिले में पंपा है. हालांकि, मुख्य मंदिर शहर से तकरीबन 5 किमी दूरी पर लंबी पर्वत श्रृंखला और घने जंगल हैं, जहां पैदल ही जाना होता है. पूरा क्षेत्र चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा हुआ है. कहा जाता है कि मंदिर का वास्तविक नाम सबरिमलय है, लेकिन धीरे-धीरे लोग इसे सबरीमाला कहने लगे.

ये है 18 पवित्र सीढ़ियों का महत्व
मान्यता है कि मंदिर तक पहुंचने के लिए 18 पवित्र सीढ़ियों का पार करना होता है. पहली पांच सीढियों को मनुष्य की पांच इन्द्रियों से जोड़ा गया है. इसके बाद की 8 सीढ़ियों को मानवीय भावनाओं से जोड़ कर देखा जाता है. अगली तीन सीढियों को मानवीय गुण से जोड़ा जाता है. इसके बाद अंतिम दो सीढ़ियों को ज्ञान और अज्ञान से जोड़ा जाता है.

उम्र और रंग की मान्यता
मान्यता के मुताबिक, भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं. ऐसे में मेंशुरेशन को ध्यान में रखते हुए महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित है. इसी को ध्यान में रखते हुए 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को छोड़कर सभी पुरुष और महिला मंदिर में जा सकते हैं. मंदिर में एक ड्रेस कोड भी है, जिसके पीछे भी तर्क है. मंदिर में सिर्फ काला वस्त्र पहन कर जाया जा सकता है, जिसपर कहा जाता है कि काला रंग खुशियों के त्याग का प्रतीक है और हर जाति-धर्म के लिए अयप्पा बराबर हैं.

मंदिर का निर्माण
मान्यता है कि भगवान परशुराम ने अय्यपा की पूजा के लिए सबरीमाला में मूर्ति की स्थापना की थी. कुछ लोग राम भक्त शबरी से तो कइयों का मानना है कि 700 से 800 साल पहले शैव और वैष्णव संप्रदाय के लोगों के बीच मतभेद बहुत बढ़ गए थे, तब उन मतभेदों को दूर करने और धार्मिक सद्भाव बढ़ाने के उद्देश्य से अयप्पा की परिकल्पना की गई थी. इसे मिसाल के तौर पर देखा जाने लगा कि यहां सभी पंथ के लोग आ सकते हैं.