नई दिल्ली| उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में स्थित केदारनाथ मंदिर के आज कपाट खुल गए. आज से ये मंदिर भक्तों के लिए खुल गया है. ठंड के दिनों में इसे बंद कर दिया जाता है. इस खास मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां पहुंचे और पूजा-अर्चना की. यही वो मंदिर है जहां साल 2013 में भीषण प्रलय आया था जिसमें सैंकड़ों लोगों की जान चली गई थी. जानने की कोशिश करते हैं क्या है इस मंदिर का इतिहास और हिंदुओं के लिए इसका क्या महत्व है.

12 ज्योतिर्लिंगों में से एक

कहते हैं केदारनाथ धाम की यात्रा से इंसान के सारे दुख दूर हो जाते हैं. भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित भगवान शिव का यह मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग को सर्वोच्च माना जाता है. इस धाम की यात्रा करना हर तीर्थयात्री का सपना होता है. तीन तरफ विशालकाय पहाड़ो घिरा केदारनाथ धाम बेहद मनमोहक है. हिंदू धर्म की आस्था के अनुसार केदारनाथ धाम को ऊर्जा का बड़ा केंद्र माना जाता है. इस मंदिर का जब 6 महीनों बाद कपाट खुलता है तब भी इस मंदिर का दिया जलता रहता है. भगवान शिव का यह मंदिर 85 फुट ऊंचा, 187 फुट लंबा और 80 फुट चौड़ा है.

कई तरह की कथाएं प्रचलित

केदारनाथ धाम को लेकर कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं. कहतें हैं इसी जगह पर पांडवों ने भी शिव के एक मंदिर का निर्माण करवाया था. लेकिन वक्त के साथ वह नष्ट हो हो गया था. जिसके बाद कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण आदि गुरु शंकराचार्य ने दसवीं ईसवी में करवाया था. यह मंदिर जो 400 वर्ष तक बर्फ में दबा था. यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा भोज ने भी कराया था. फिलहाल हम उन्ही बातों को बता रहें हैं जिनकी चर्चा सदियों से होती आ रही है.

यह भी मान्यता है
पुराण की कथा के अनुसार हिमालय पर्वत पर भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण ऋषि घनघोर तपस्या किया था. उनकी इस तपस्या से खुश होकर भगवान शिव प्रकट हुए और वरदान के रूप में भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में पृथ्वी पर बस गए. यह भी कहा जाता है कि यहां पशुपतिनाथ का पिछला हिस्सा विराजित है.

जब महाभारत का भीषण युद्ध समाप्त हुआ तो उसके बाद पांडवों पर परिवार के लोगों की हत्या का दोष लग गया. इससे मुक्ति पाने के लिए पांडव जब शिव के पास पहुंचे तो उन्होंने बैल का रूप धर लिया. लेकिन भीम ने बैल के पैर पकड़ने की कोशिश की और फिर वो गायब हो गए. यही कारण है कि आज भी पशुपतिनाथ मंदिर में बैल के अगले और केदरनाथ में पिछले हिस्से की पूजा की जाती है.