चेन्नई: द्रमुक नेता एम.के.स्टालिन को मंगलवार को निर्विरोध पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया गया. यहां हुई पार्टी की आम सभा की बैठक में द्रमुक के महासचिव के. अंबाजगन ने कहा कि स्टालिन को निर्विरोध चुन लिया गया है. पार्टी प्रमुख के पद के लिए 26 अगस्त को नामांकन भरने वाले वह एकमात्र उम्मीदवार थे. पार्टी अध्यक्ष और पिता एम. करुणानिधि की मृत्यु के तीन सप्ताह बाद 65 वर्षीय स्टालिन को द्रमुक प्रमुख चुना गया है. करुणानिधि का सात अगस्त को निधन हो गया था. हालांकि स्टालिन के बड़े भाई और द्रमुक से निष्कासित नेता एम. के. अलागिरी ने धमकी दी थी कि यदि उन्हें पार्टी में वापस नहीं लिया गया तो इसके अंजाम सही नहीं होंगे.

 

द्रमुक के प्रधान सचिव दुरई मुरूगन को पार्टी का नया कोषाध्यक्ष चुना गया है. वह स्टालिन की जगह लेंगे, जिनके अध्यक्ष बनने के कारण पार्टी कोषाध्यक्ष का पद खाली हो गया था. द्रमुक के महासचिव के.अंबाझगन ने कहा कि पार्टी के 1,307 अधिकारियों ने स्टालिन की उम्मीदवारी का समर्थन किया. जनरल काउंसिल ने इसकी घोषणा करने से पहले करुणानिधि, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान व करुणानिधि के निधन की खबर से सदमे में आकर मरे पार्टी के कार्यकर्ताओं व स्टेरेलाइट कॉपर स्मेलटर प्लांट के विरोध के दौरान मारे गए प्रदर्शनकारियों के निधन पर पर शोक जताया.

इससे पहले द्रमुक से निष्कासित नेता एम. के. अलागिरी ने अपने छोटे भाई एम. के. स्टालिन की पार्टी अध्यक्ष पद पर ताजपोशी से एक दिन पहले अपना रुख कड़ा करते हुए कहा था कि वह पांच सितंबर को प्रस्तावित मार्च करेंगे और यदि उन्हें पार्टी में दोबारा शामिल नहीं किया गया तो पार्टी को नतीजे भुगतने होंगे. दक्षिणी तमिलनाडु में अच्छा-खासा प्रभाव रखने वाले अलागिरी बीते सात अगस्त को अपने पिता एम. करुणानिधि के निधन के बाद से ही सख्त रुख अपना रहे हैं. उन्होंने कहा कि वह कार्यकर्ताओं की इच्छा के अनुरूप चेन्नई में रैली का आयोजन करने वाले हैं.

उन्होंने पत्रकारों को बताया, ‘वे (कार्यकर्ता) सिर्फ यह चाहते हैं कि मैं (करुणानिधि को) श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए किए जाने वाले मार्च का आयोजित करने में अग्रणी भूमिका निभाऊं.’ अलागिरी ने कहा कि करुणानिधि के निधन के बाद द्रमुक को बचाने की खातिर वह यह सब कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘कलैनार (करुणानिधि) अब नहीं हैं. पार्टी को बचाना है. यदि उन्होंने मुझे फिर से शामिल नहीं किया तो उन्हें नतीजे भुगतने पड़ेंगे. साल 2014 में करुणानिधि की ओर से पार्टी से निकाले जाने के बाद से अलागिरी राजनीतिक एकांतवास में हैं. उन्हें पार्टी से उस वक्त निकाला गया था जब पार्टी में वर्चस्व कायम करने को लेकर स्टालिन से उनकी लड़ाई चरम पर थी.