नई दिल्ली: एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने मंगलवार को कहा कि निजी टीवी चैनलों को अनुसूचित जातियों के लोगों के लिए दलित शब्द का इस्तेमाल करने से बचने का केंद्र सरकार की सलाह जाति आधारित अत्याचार के खिलाफ उठ खड़े हुए दलित अधिकार आंदोलन को बाधित करेगा. एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की कार्यक्रम निदेशक अस्मिता बसु ने कहा, ‘प्रगतिशील सामाजिक संगठनों ने जाति आधारित अत्याचार के खिलाफ अपनी लड़ाई में अपनी पहचान पर जोर देने के लिए 1970 के दशक में ‘दलित’ शब्द को स्वीकार किया था. ‘दलित’ एक शब्द से कहीं अधिक है, यह एक साझी पहचान है जो भारत में इस समुदाय द्वारा सामना किए गए ऐतिहासिक भेदभाव को बयां करता है. Also Read - Lockdown In India: लॉकडाउन के दौरान 11 राज्यों में 45 फीसदी लोगों को खाने के लिए पैसे लेने पड़े उधार, दलित-मुस्लिम सबसे अधिक परेशान

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उन्होंने कहा कि दलित शब्द का इस्तेमाल नहीं करने के लिए मीडिया को कहने का सरकार के पास कोई अधिकार नहीं है. दलित संगठन जिस भी तरीके से अपनी पहचान स्थापित करना चाहते हैं, उस बारे में उनके अधिकार का सरकार को सम्मान करना चाहिए. गौरतलब है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सभी निजी टीवी चैनलों को परामर्श जारी कर उनसे बंबई उच्च न्यायालय के निर्देश अनुपालन में अनुसूचित जाति के लोगों के लिए दलित शब्द का इस्तेमाल करने से बचने को कहा है.

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एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने एक बयान में कहा है कि उसने दो निजी चैनलों से बात की, जिन्होंने इस बात की पुष्टि की है कि उन्होंने लेटर प्राप्त किया है. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि अखबारों और पत्रिकाओं ने भी क्या यह परिपत्र प्राप्त किया है. बयान में कहा गया है कि मंत्रालय ने इस बात का जिक्र नहीं किया है कि क्या परिपत्र बाध्यकारी है.

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दलित मानवाधिकारों के लिए राष्ट्रीय अभियान (एनसीडीएचआर) के महासचिव पॉल दिवाकर के हवाले से एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने कहा है कि यदि मीडिया को मूल अधिकारों का उपयोग करने से रोका जाता है तो यह गरिमा के अधिकार का हनन होगा और उन लोगों के जीवन के अधिकार का उल्लंघन होगा जो जाति आधारित अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं.

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मानवाधिकार संगठन ने कहा कि यह पहला मौका नहीं है जब केंद्र सरकार ने दलित शब्द के इस्तेमाल पर ऐतराज जताया है. एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने कहा कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने इस साल 15 मार्च को राज्य सरकारों और केंद्र शासित क्षेत्रों के मुख्य सचिवों को पत्र लिख कर कहा था, ‘‘…केंद्र सरकार / राज्य सरकारों और उनके पदाधिकारियों को अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के लिए दलित शब्द का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए क्योंकि इस शब्द का जिक्र संविधान में, या किसी विधान में नहीं है.