शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री प्रत्याशी की घोषणा के साथ ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का सारा दारोमदार इन चार कंधों पर आकर टिक गया है – मुख्यमंत्री पद की प्रत्याशी शीला दीक्षित, नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर, प्रदेश प्रभारी गुलाम नबी आजाद और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर। कांग्रेस ने वर्तमान में उपलब्ध सबसे बेहतर विकल्पों पर ही अपना दाँव खेला है।Also Read - West Bengal में नहीं चलेगी Prashant Kishor की रणनीति, BJP के राजीब बनर्जी बोले- यहां सिर्फ Narendra Modi चलेंगे

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कांग्रेस उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर काफी पहले से सजग हो गई है। कई महीने पहले से ही उसने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को यूपी के मैदान में उतार दिया है। प्रशांत लोकसभी चुनाव में नरेंद्र मोदी की टीम थे और बिहार चुनावों में भी उन्होंने नितीश की नैया पार लगाई थी। कांग्रेस पार्टी को यूपी में भी उनसे किसी करिश्में की उम्मीद है। पार्टी के ज्यादातर फैसलों में प्रशांत किशोर का दखल देखा जा सकता है। दिल्ली की मुख्यमंत्री पद के लिए शीला दीक्षित भी उन्हीं की पसंद हैं।

साभार- इंडियन एक्सप्रेस

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गुलाम नबी आजाद भी पूरी मेहनत से अपनी भूमिका निभा रहे हैं। प्रदेश के नेताओं और कांग्रेस आलाकमान के बीच एक पुल के रूप में गुलाम नबी आजाद अच्छा काम कर रहे हैं। उन पर एक बड़ी जिम्मेदारी है।

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पिछले दिनों कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के रूप में राजबब्बर के नाम ने थोड़ा चौंकाया था लेकिन सीमित विकल्पों के बीच कांग्रेस का यह फैसला भी ठीक ही कहा जा सकता है। राजबब्बर अच्छा बोल लेते हैं। कार्यकर्ताओं को रिझाने में भी उनकी महारत है। पार्टी के क्रियाकलाप में उनका आने से एक जोश भरा है।

raj babbar

कांग्रेस ने सबसे बड़ा दाँव शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री प्रत्याशी बनाकर खेला है। शीला दीक्षित अनुभवी हैं और 15 सालों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री का कार्यभार सँभाल चुकी हैं। यूपी में प्रशांत किशोर किसी ब्राह्मण नेता को सीएम प्रत्याशी बनाना चाहते थे। शीला दीक्षित का यूपी से संबंध भी रहा है और वह ब्राह्मण परिवार से भी हैं। उनके साथ समस्या यह है कि कई घोटालों पर उनसे पूछताछ चल रही है। भाजपा इसका फायदा उठाकर हमला कर सकती है।

देखा जाए तो कांग्रेस ने उपलब्ध सबसे बेहतर विकल्पों में अपना दाँव खेला है। लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि ये चार कंधे कितनी दूर तक कांग्रेस को खींच कर ले जा पाते हैं।