नई दिल्ली: आंध्र प्रदेश में 11 अप्रैल को लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव होने जा रहा है. 2014 में आंध्र प्रदेश के विभाजन से पहले विधानसभा और लोकसभा दोनों के चुनाव हुए थे. उस समय त्रिकोणीय मुकाबला हुआ था. एक तरफ टीडीपी, बीजेपी और जन सेना समर्थित गठबंधन था तो दूसरी तरफ वाईएसआर कांग्रेस. तीसरे प्लेयर के रूप में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था. हालांकि इन पांच सालों में बहुत कुछ बदला है. बीजेपी-टीडीपी गठबंधन टूट चुका है. अभिनेता से नेता बने पवन कल्याण की पार्टी जन सेना ने इस बार सीपीआई और सीपीआईएम से गठबंधन कर लिया है. जन सेना पार्टी के समर्थन वापस लेने के बाद टीडीपी के वोट शेयर में 8 प्रतिशत की गिरावट आई है. इसका फायदा कांग्रेस को मिल सकता है और राज्य में उसकी स्थिति सुधर सकती है. राज्य में किस पार्टी की क्या स्थिति है, डालते हैं एक नजर.

तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी)
राज्य में तेलुगु देशम पार्टी की सरकार है. चंद्रबाबू नायडू मुख्यमंत्री हैं. नायडू को सरकार के काम और जन कल्याणकारी योजनाओं पर भरोसा है. वह अपने काम के दम पर चुनाव मैदान में उतरेंगे. सीएम ने महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों के विकास के तहत लाभार्थियों को हर साल 10 हजार रुपए मिलते हैं. इस कार्यक्रम के तहत स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 94 लाख महिलाओं को फरवरी से अप्रैल तक तीन महीनों में वित्तीय सहायता मिलेगी. राज्य की चंद्रबाबू नायडू की सरकार ने किसानों के 1.5 लाख रुपए तक की कर्जमाफी की है. राज्य सरकार की ओर से 35 साल तक के ग्रेजुएट बेरोजगारों को 2000 रुपए मिलते हैं. इसके अलावा पेंशन की राशि भी बढ़ाकर एक हजार से दो हजार कर दी गई है. नायडू को अपनी सरकार के काम पर भरोसा है. हालांकि सरकार में होने की वजह से उन्हें एंटी इनकंबेंसी का सामना करना पड़ सकता है.

वाईआरएस कांग्रेस
कहते हैं कि आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री तक की कुर्सी का रास्ता गांवों की धूलभरी सड़कों से होकर जाता है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी ने 2004 में पैदल ही गांवों की खाक छान थी. इसके 10 साल बाद चंद्रबाबू नायडू ने पैदल मार्च निकाला था. इस मंत्र को वाईएस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगमोहन रेड्डी ने माना और उन्होंने पैदल 3,650 किलोमीटर की खाक छानी. जगमोहन रेड्डी को लगता है कि 2014 की तुलना में 2019 में उनकी स्थिति अच्छी है. जगन ने छह नवंबर, 2017 को कडपा जिले के अपने गृहनगर इदुपुलापाया से पदयात्रा शुरू की थी. पूर्व चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को जगन की पदयात्रा के फैसले के पीछे माना जा रहा है. मुख्यमंत्री एन.चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाली तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) से सत्ता छीनने की कोशिश में जगन अपने पिता व आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी के नक्शेकदम पर चल रहे हैं.

जन सेना
राज्य में कापू और पिछड़ा वर्ग दोनों ही किसी पार्टी की हार और जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. कापू और ओबीसी दोनों कुल मतदाताओं का लगभग 52 प्रतिशत हैं. पिछली बार ये दोनों समूह टीडीपी के साथ थे और चंद्रबाबू नायडू को मुख्यमंत्री बनाने में मदद की थी. राज्य में कापू 15.2 प्रतिशत हैं, पिछड़ा वर्ग 143 समूह में बंटा है और आंध्र प्रदेश की कुल आबादी का 37 प्रतिशत है. इस बार संभावना है कि कापू पवन कल्याण की जातिगत साख के कारण जन सेना के साथ जा सकते हैं. कापू और बीसी दोनों गोदावरी जिलों में संख्या में अधिक हैं. पवन कल्याण इन दो जिलों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. अभिनेता से नेता बने पवन कल्याण की पार्टी जन सेना ने इस बार सीपीआई और सीपीआईएम से गठबंधन कर लिया है. वह कितनी सीटें जीतेगी ये कहना मुश्किल है लेकिन वह टीडीपी और वाईआरएस कांग्रेस के ही वोट काटेगी.

बीजेपी
वर्ष 2014 में भाजपा का टीडीपी के साथ गठबंधन था और इस गठजोड़ को तेलुगू फिल्म स्टार पवन कल्याण की जन सेना पार्टी ने अपना समर्थन दिया था.जन सेना ने उस चुनाव में किसी सीट पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे. लेकिन इस बार, टीडीपी, भाजपा से राजनीतिक संबंध तोड़कर चुनावी मैदान में अकेले उतरी है. भाजपा के लिए यहां कुछ भी दांव पर नहीं है लेकिन यह राज्य की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता साबित करने का प्रयास करेगी. टीडीपी ने 175 सदस्यीय विधानसभा की 102 सीटें जीती थीं. वाईएसआर कांग्रेस को 67 और भाजपा को 4 सीटें मिली थीं.

कांग्रेस
2014 में राज्य के विभाजन के बाद करारी हार झेल चुकी कांग्रेस आंध्र प्रदेश में फिर से मजबूत होने की कोशिश में है. कांग्रेस और टीडीपी ने पिछले साल दिसंबर में तेलंगाना में मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन कांग्रेस की करारी हार के बाद यह गठजोड़ टूट गया. कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है.