नई दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने मूल अजा-अजजा (उत्पीड़न की रोकथाम) कानून, 1989 बनाये रखने के निर्देश के लिए दायर याचिका के याचिकाकर्ता को शुक्रवार को चार सप्ताह का समय दिया ताकि वह इस कानून के तहत दर्ज प्राथमिकियों का आंकड़ा एकत्र कर सके. संसद ने शीर्ष अदालत के 20 मार्च के फैसले को बदलने के लिये नौ अगस्त को इस कानून में नये संशोधन किए थे. नये संशोधनों में इस कानून के तहत आरोपी व्यक्ति के लिये अग्रिम जमानत की संभावना खत्म कर दी गयी थी. Also Read - बिहार: CM नीतीश के खिलाफ कोर्ट में केस दर्ज, लगा है बड़ा आरोप, 14 सितंबर को सुनवाई

शीर्ष अदालत ने 20 मार्च को अपने फैसले में कहा था कि इस कानून के तहत दर्ज किसी भी शिकायत पर तत्काल गिरफ्तारी नहीं की जायेगी और इस कानून के तहत किसी लोक सेवक को सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बाद ही गिरफ्तार किया जा सकता है. इस फैसले के बाद कई अजा-अजजा संगठनों द्वारा दो अप्रैल को आयोजित भारत बंद के दौरान अनेक राज्यों में हिंसा और टकराव की घटनाओं को देखते हुये केन्द्र ने इस निर्णय पर पुनर्विचार के लिये याचिका दायर की थी. Also Read - एससी, एसटी आरक्षण 10 साल बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन बिल लोकसभा में पेश

न्यायमूर्ति ए के सीकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ के समक्ष शुक्रवार को यह मामला सुनवाई के लिये आया था. याचिकाकर्ता आल इंडिया फेडरेशन आफ एससी-एसटी आर्गेनाइजेशंस के वकील ने पीठ से कहा कि वे इस कानून के तहत दर्ज प्राथमिकियों का देशव्यापी आंकड़ा एकत्र कर रहे हैं. वकील ने जब केन्द्र सरकार की पुनर्विचार याचिका का जिक्र किया तो पीठ ने कहा पहले से ही याचिका लंबित है और आप उसमें हस्तक्षेप कर सकते हैं. Also Read - सरकार ने SC/ST कानून को कमजोर करने की कोशिश की, दलितों के मुद्दे पर खोलेंगे मोर्चा: कांग्रेस

न्यायालय ने बाद में याचिकाकर्ता को आंकड़े एकत्र करने के लिये चार सप्ताह का वक्त दे दिया. इस संगठन ने याचिका में अनुरोध किया है कि अजा-अजजा कानून, 1989 के मूल स्वरूप को बनाये रखने का निर्देश दिया जाए. इसी तरह, याचिका में 1989 के कानून की छानबीन के लिये शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने का भी अनुरोध किया गया है.