68वें गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति ने हवलदार हंगपन दादा को मरणोपरांत आशोक चक्र से सम्मानित किया। हंगपन दादा की पत्नी ने यह सम्मान ग्रहण किया। इस दौरान वह अपनी भावनाओं को नहीं रोक पाई और उनकी आंखों से आंसू छलक आए। उत्तरी कश्मीर की बर्फीली हिमालयी पहाड़ियों पर 12 हजार फुट की उंचाई पर चार घुसपैठिए आतंकवादियों को मार गिराकर जान गंवाने वाले हवलदार हंगपन दादा की इस बहादुरी के लिए उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।

इस साल 27 मई को देश के लिए अपनी जान दे देने वाले 36 साल के दादा ने उत्तरी कश्मीर के शमसाबरी रेंज में बहादुरी के साथ संघर्ष करते हुए चार हथियारबंद आतंकवादियों को समाप्त कर दिया जो पाक के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से उत्तरी कश्मीर में घुस आये थे।

अरुणाचल प्रदेश के बोदुरिया गांव के रहने वाले हवलदार हंगपन अपनी टीम में ‘दादा’ के नाम से लोकप्रिय थे। वह पिछले साल से उच्च पर्वतीय रेंज में तैनात थे। सेना की असम रेजीमेंट में शामिल किए गए दादा को 35 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात किया गया था।
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दादा के बड़े भाई का नाम था लाफांग दादा। हंगपन दादा के बचपन को याद करते हुए वो बताने लगे कि वो बहुत शरारती था। लोगों के फलों वाले पेड़ पर चढ़ कर फल तोड़ लाता और खुद भी खाता था और दोस्तों को भी खिलाता था। और मेहनती भी बहुत था। प्रतिदिन दौड़ता था और 20-25 पुशअप्स रोज लगाता था। हंगपन फौज में जाने के लिए दीवाना था।

हंगपन के बचपन के एक दोस्त ने बताया कि आज मैं जिंदा हूं तो दादा की देन है। मैं पानी में डूब रहा था तो उन्होंने मुझे पानी में डूबने से बचाया था। दादा फुटबाल खेलने, रनिंग करने, पेड़ में चढ़ने में आगे रहते थे। उनको सभी काम में जीतना पसंद था।

दादा की वाइफ चसेन ने बताया कि दादा को दूसरों के साथ घुलना-मिलना और उनसे देर तक बातें करना बहुत अच्छा लगता था। और दादा की पत्नी ने यह भी बताया कि हमने अपनी शादी चर्च में की थी।