गोभी की खेती को लेकर क्यों मचा बवाल? कांग्रेस-BJP नेता के बीच हुई तीखी बहस, जानें कहां से उठा विवाद

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे सामने आने के बाद अशोक सिंघल की गोभी की पोस्ट ने सोशल मीडिया पर विवाद खड़ा कर दिया. आइए खबर में जानते हैं ये घमासान क्यों शुरू हुआ और कैसे राजनीतिक मुद्दा बन गया.

Published date india.com Published: November 16, 2025 10:35 PM IST
गोभी की खेती को लेकर क्यों मचा बवाल? कांग्रेस-BJP नेता के बीच हुई तीखी बहस, जानें कहां से उठा विवाद

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए की बड़ी जीत के बाद असम के कैबिनेट मंत्री अशोक सिंघल ने एक्स पर एक तस्वीर साझा की, जिसमें गोभी की खेती दिख रही थी. उन्होंने लिखा, बिहार ने गोभी की खेती की मंजूरी दी. हालांकि पोस्ट सीधे चुनावी जश्न से जुड़ा था, कई यूजर्स ने इसे अलग नजरिए से देखना शुरू कर दिया और पुराने संवेदनशील घटनाक्रम से जोड़ दिया. यही कारण था कि एक सामान्य कृषि-संबंधी फोटो अचानक राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई.

भागलपुर दंगों से जोड़ी रही सोशल मीडिया पोस्ट

सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने इस तस्वीर को 1989 के भागलपुर दंगों से जोड़ा. उस समय 24 अक्टूबर 1989 को दंगे शुरू हुए थे, जिनमें लगभग 250 गांव प्रभावित हुए और हजारों लोग मारे गए. इतिहासकारों के अनुसार लोदीपुर और अन्य संवेदनशील इलाकों में मृतकों के दफन स्थल पर बाद में गोभी के पौधे लगाए गए थे. इसी वजह से असम मंत्री की फोटो ने विवाद को जन्म दिया. कई लोग इसे संवेदनशील इतिहास के साथ जोड़कर देखते रहे, जिससे सोशल मीडिया पर बहस तेजी से फैल गई.

कांग्रेस नेता शशि थरूर क्या बोले?

कांग्रेस सांसद शशि थरूर को पोस्ट में टैग करते हुए एक यूजर ने पूछा कि क्या वे इस पर निंदा करेंगे. थरूर ने अप्रत्यक्ष रूप से जवाब देते हुए कहा कि वह किसी को सम्मिलित बयान देने के लिए बाध्य नहीं कर सकते, लेकिन एक प्राउड हिंदू और समावेशी भारत के समर्थक के तौर पर यह स्पष्ट किया कि न हिंदू धर्म और न ही भारतीय राष्ट्रवाद किसी भी नरसंहार या हिंसा को सही ठहराता है. उनके इस बयान के बाद विवाद और राष्ट्रीय स्तर पर पहुँच गया और सोशल मीडिया पर बहस और तेज हो गई.

विवाद से राजनीतिक माहौल गर्माया

इस विवाद ने चुनावी माहौल को गर्मा दिया. विपक्ष ने मंत्री की पोस्ट को अनुचित बताया, जबकि समर्थक इसे गलत व्याख्या कह रहे हैं. यूजर्स का दोध्रुवी नजरिया है – कुछ इसे संवेदनशील इतिहास को छूने वाला मानते हैं, जबकि कुछ इसे हल्का-फुल्का राजनीतिक तंज ही समझते हैं. फिलहाल बहस थमने का नाम नहीं ले रही और राजनीतिक हलचल जारी है. यह मामला यह दिखाता है कि सोशल मीडिया पर छोटे पोस्ट भी बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले सकते हैं.

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