असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस का पहला ड्राफ्ट जारी कर दिया गया है. 31 दिसंबर की आधी रात को को 1.94 करोड़ लोगों की पहली लिस्ट जारी हुई जिन्हें वैध माना गया है. 1.39 करोड़ लोगों के नाम इसमें शामिल नहीं है जिनके भविष्य पर आशंका के बादल मंडरा रहे हैं. सरकार का कहना है कि किसी को घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि दूसरी लिस्ट भी जारी की जाएगी. इस बीच अफवाहों और तनाव का माहौल बना हुआ है.

सरकार अलर्ट, सुरक्षाबल तैनात

सुप्रीम कोर्ट के दबाव में उठाए गए इस बड़े कदम के बीच राज्य सरकार ने किसी भी अप्रिय हालात से निपटने की तैयारी कर ली है. राज्य में भारी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है. केंद्र सरकार भी राज्य सरकार के लगातार संपर्क में है. सरकार ने सोशल मीडिया पर कड़ी निगरानी रखनी शुरू कर दी है.

1.94 करोड़ लोगों को वैधता

रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया शैलेश ने बताया कि ये ड्राफ्ट का पहला हिस्सा है. एनआरसी में 1.94 करोड़ लोगों को वैधता प्रदान की गई है. बाकी नाम अभी तक विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजर रहे हैं. जिनका नाम लिस्ट में नहीं है उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है. जब उनका वेरीफिकेशन पूरा हो जाएगा, हम दूसरे ड्राफ्ट के साथ आएंगे. जब एनआरसी में सभी नाम आ जाएंगे तब आपत्तियों की सुनवाई की जाएगी. शैलेश ने कहा कि पूरी प्रक्रिया साल 2018 के अंदर पूरी कर ली जाएगी.

वहीं, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के राज्य समन्यवयक प्रतीक हजेला ने कहा कि जिन लोगों का नाम पहली सूची में शामिल नहीं है, उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है. हजेला ने कहा कि नामों की जांच एक लंबी प्रक्रिया है. इसलिए ऐसी संभावना है कि पहले मसौदे में कई ऐसे नाम छूट सकते हैं जो एक ही परिवार से आते हों. उन्होंने कहा कि चिंता की जरूरत नहीं है क्योंकि बाकी के दस्तावेजों का सत्यापन चल रहा है. अगले मसौदे के लिये संभावित समय सीमा के बारे में पूछे जाने पर आरजीआई ने कहा कि इसका फैसला उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार किया अप्रैल में इसकी अगली सुनवाई के दौरान किया जाएगा.  हजेला ने कहा कि अंतिम मसौदा आते ही शिकायतों पर कार्रवाई की जाएगी, क्योंकि बचे हुए नाम आखिरी मसौदे में शामिल किए जाने की संभावना है. समूचे असम में बने एनआरसी के सेवा केंद्रों पर लोग एक जनवरी को सुबह आठ बजे से पहले मसौदे में अपने नाम तलाश सकते हैं. इसे ऑनलाइन और एसएमएस सेवा के जरिये भी देखा जा सकता है.

आवेदन की प्रक्रिया मई, 2015 में शुरू हुई थी, जिसमें समूचे असम के 68.27 लाख परिवारों से 6.5 करोड़ दस्तावेज मिले थे.  असम एकमात्र ऐसा राज्य है जिसके पास एनआरसी है. इसे सबसे पहले साल 1951 में तैयार किया गया था. 20वीं सदी से ही राज्य में बांग्लादेश से लोगों का प्रवाह रहा है. संपूर्ण प्रक्रिया पर निगरानी रख रहे सुप्रीम कोर्ट ने करीब दो करोड़ दावों की जांच के बाद 31 दिसंबर तक एनआरसी का पहला मसौदा प्रकाशित करने का आदेश दिया था. जांच में करीब 38 लाख लोगों के दस्तावेज संदिग्ध मिले थे.

बांग्लादेशी घुसपैठ बड़ी समस्या

दरअसल, असम से बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए ये कदम उठाया गया है. ये मामला कई सालों से लंबित है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 31 दिसंबर को पहला ड्राफ्ट जारी किया गया है. बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर असम में कई बार तनाव का माहौल बन चुका है और हिंसक आंदोलन हुए हैं. इस मुद्दे पर ही असम गण परिषद का भी जन्म हुआ जिसने एक बार सरकार भी बनाई है, लेकिन मामले का हल वो भी निकाल नहीं पाई.

असम में घुसपैठ एक बड़ा मुद्दा रहा है. 80 के दशक में इसे लेकर छात्र आंदोलन भी हुआ. तब राजीव गांधी सरकार और असम गण परिषद के बीच एक समझौता भी हुआ था कि 1971 के बाद आने वाले बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर निकाला जाएगा और इससे पहले आने वालों को नागरिकता दी जाएगी. लेकिन असम गण परिषद की सरकार बनने के बाद भी इस पर कभी अमल नहीं हो सका.

2005 में ये मामला दोबारा उठा और कांग्रेस सरकार ने इस पर काम करना शुरू किया. लेकिन काम बेहद सुस्त था और इसी बीच 2013 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. कोर्ट ने सख्त रूख दिखाते हुए हर हाल में पहला ड्राफ्ट 31 दिसंबर से पहले प्रकाशित करने का आदेश दिया था. असम में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इसे बड़ा मुद्दा भी बनाया था और जिसका उसे फायदा भी हुआ. असम में उसकी सरकार बनी है सर्वानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री बने.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बना ड्राफ्ट

सुप्रीम कोर्ट के दबाव में पहला ड्राफ्ट जारी हो गया है और दूसरी पर काम चल रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जिनका नाम लिस्ट में नहीं होगा उनका क्या होगा? क्या उन्हें बांग्लादेश वापस भेजा जाएगा? इन्हीं संभावनाओं, आशंकाओं के बीच सरकार ने सुरक्षाबलों को पूरी तरह अलर्ट कर दिया है. लेकिन ऐसा करना मुमकिन नहीं दिखता. बांग्लादेश से आने वाले लाखों लोगों में हिंदू भी हैं जो बीजेपी समर्थक हैं. इसके अलावा हालिया समय में मोदी सरकार ने बांग्लादेश से संबंध सुधारकर नई दिशा में कदम बढ़ाया है. ऐसे में घुसपैठियों को वापस बांग्लादेश भेजना बीजेपी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होगा.