नई दिल्ली: करीब दो महीने बीत चुके हैं जब कर्नाटक में विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने खुद को पहली बार प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया था. उन्होंने स्पष्ट कहा था कि 2019 के आम चुनावों के बाद वे देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं. विपक्षी पार्टियों ने उनके इस दावे का मजाक उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उनसे उम्मीद भी यही थी, क्योंकि राहुल से संबंधित हर बात का विपक्षी नेता और उनके समर्थक सोशल मीडिया पर चटखारे लेते हैं. लेकिन राहुल और कांग्रेस समर्थकों के लिए चिंता की बात यह है कि सिवाय तेजस्वी यादव के, किसी भी पार्टी ने उनकी दावेदारी का अब तक खुलकर समर्थन नहीं किया है. वहीं दूसरी ओर, भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए नरेंद्र मोदी के नाम पर ही अगला चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर चुका है. हालांकि, अभी भले ऐसा लग रहा हो कि राहुल की दावेदारी को लेकर कांग्रेस के सहयोगी दल भी गंभीर नहीं हैं, लेकिन इस साल होने वाले तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद स्थितियां तेजी से बदल सकती हैं.

भाजपा शासन वाले तीन राज्यों में हैं चुनाव
इस साल के अंत में तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं- मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान. तीनों ही राज्यों में फिलहाल भाजपा की सरकारें हैं. यानी तीनों राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टी को एंटी-इंकम्बेंसी का सामना करना है. इस लिहाज से कांग्रेस के लिए परिस्थितियां अनुकूल हैं लेकिन जीत का रास्ता आसान नहीं है. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस एक दशक से ज्यादा समय से सत्ता से दूर है. दोनों ही राज्यों में पार्टी का संगठन गुटों में बंटा हुआ है जबकि भाजपा पूरे दमखम से चुनाव की तैयारियों में लग चुकी है. राजस्थान में जरूर कांग्रेस की सत्ता में वापसी की संभावनाएं प्रबल हैं क्योंकि राज्य की वसुंधरा राजे सरकार के प्रति समाज के अलग-अलग तबकों में असंतोष ज्यादा है.

कर्नाटक की कामयाबी बनी संजीवनी
दिसंबर, 2017 में कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद से ही राहुल अपनी गोटियां फिट करने में लगे हैं. एनडीए से बाहर के दलों के साथ संपर्क साधने के अलावा वे संसद से लेकर सड़क तक केंद्र सरकार के खिलाफ एकजुट विपक्षी मुहिम पर जोर दे रहे हैं. शुरुआत में उन्हें इसमें भी खास कामयाबी नहीं मिली, लेकिन कर्नाटक में बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए जेडीएस के साथ कांग्रेस का गठबंधन कारगर साबित हुआ. इससे बीजेपी के इरादों पर अंकुश तो लगा ही, कांग्रेस की रणनीति को भी संजीवनी मिल गई.

फिलहाल पसोपेश में हैं दूसरी पार्टियां
केवल कर्नाटक ही नहीं, उत्तर प्रदेश के उपचुनावों ने भी कांग्रेस के साथ दूसरे विपक्षी दलों को बीजेपी से मुकाबले का रास्ता बता दिया है. सपा, बसपा जैसी पार्टियां भी समझ चुकी हैं कि बीजेपी को हराने के लिए एकीकृत विपक्ष ही एकमात्र विकल्प है, लेकिन चुनाव से करीब नौ महीने पहले वे यह फैसला करने की हालत में नहीं हैं कि विपक्षी एकता का स्वरूप क्या हो. इसमें कांग्रेस को शामिल किया जाए या नहीं, शामिल हो तो गठबंधन में उसकी भूमिका क्या हो, इन मुद्दों पर इतनी जल्दी फैसला करने को वे तैयार नहीं हैं.

ऐसे बदल सकता है माहौल
समस्या यह भी है कि राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस अब तक किसी चुनाव में स्पष्ट जीत हासिल नहीं कर सकी है. लेकिन इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों में यदि पार्टी जीत जाती है तो 2019 के आम चुनावों के लिए उसका विश्वास बढ़ जाएगा, साथ ही राहुल की नेतृत्व क्षमता पर उठने वाले सवाल भी पृष्ठभूमि में चले जाएंगे. राहुल के लिए अच्छी बात यह भी है कि बीजेपी की विपक्षी पार्टियों में कोई दूसरा सर्वमान्य नेता भी नहीं है. न ही किसी राजनीतिक दल की कांग्रेस की तरह राष्ट्रीय पहुंच है. यानी नरेंद्र मोदी से मुकाबले के लिए चेहरे की तलाश सबको है. विधानसभा चुनावों में जीत से यह तलाश राहुल गांधी पर आकर खत्म हो सकती है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस जीत गई तो दूसरी पार्टियां खुद ब खुद उसकी ओर खिंची चली आएंगी. विधानसभा चुनावों में जीत का टॉनिक राहुल को सर्वमान्य नेता के फ्रेम में फिट बैठा सकता है, लेकिन एक और हार उनके राजनीतिक भविष्य पर सबसे बड़ा सवालिया निशान भी खड़े कर सकता है.