नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अध्यक्ष अमित शाह अक्सर कहते हैं कि अगले लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी 2014 में मिली 282 सीटों के मुकाबले ज्यादा सीटें जीतेगी. 11 दिसंबर को पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के नतीजे आने तक उनके इस दावे पर कम ही लोग संदेह करते थे, लेकिन अब यह काफी मुश्किल काम मालूम हो रहा है. इसका कारण यह है कि भाजपा को उन्हीं राज्यों में एकजुट एवं उत्साह से भरे विपक्ष का सामना करना पड़ रहा है जिन्होंने भगवा पार्टी की केंद्र में सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

हालिया विधानसभा चुनावों के परिणामों से मिली निराशा से पहले तक 2014 में मिली शानदार जीत के बाद से ही देश में नरेंद्र मोदी की लहर चल रही थी. पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा ने मध्यप्रदेश, राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ सहित आठ राज्यों में करीब 80 प्रतिशत लोकसभा सीटें जीती थी. अब हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में चुनावों में मिली हार ने भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं. पार्टी की राह में फिर से मजबूत हो रही कांग्रेस और 2019 चुनावों के लिए उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में विपक्षी बलों के एकजुट होने जैसी चुनौतियां सिर उठाए खड़ी हो गई हैं.

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इन आठ राज्यों ने भाजपा को 2014 में मिली 282 लोकसभा सीटों में से 221 सीटें दी थीं. एक ओर समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) उत्तर प्रदेश में भाजपा के समीकरण बिगाड़ने को तैयार है जहां उसने विभाजित विपक्ष के खिलाफ 80 में से 71 सीटें जीती थीं. दूसरी ओर कर्नाटक में कांग्रेस एवं जद(एस) के बीच गठजोड़ ने पार्टी के लिए आगे की राहें मु्श्किल कर दी हैं.

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वहीं गुजरात में 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने भाजपा की 99 सीटों के मुकाबले 81 पर जीत दर्ज कर हलचल मचा दी थी. इसके अलावा महाराष्ट्र और बिहार में भी स्थितियां भाजपा के प्रतिकूल जाती दिख रही हैं. महाराष्ट्र में शिवसेना का रुख किस करवट बैठेगा, यह कहना मुश्किल है. फिलहाल वह नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा के खिलाफ मुखर है और कई बार अकेले चुनाव में उतरने की धमकी दे चुकी है.

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बिहार में नीतीश कुमार के साथ सीटों के बंटवारे की गुत्थी सुलझ गई लगती है लेकिन रालोसपा उससे दूर हो गई है. रालोसपा अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा मोदी सरकार से मंत्री पद छोड़ चुके हैं. लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान फिलहाल राजग में संतुष्ट दिख रहे हैं, लेकिन वे अपना फैसला अंतिम समय में हवा का रुख भांप कर लेते हैं. चुनाव आने तक वे किस पाले में रहेंगे, यह दावा करना मुश्किल है. ऐसे में 2014 के प्रदर्शन को दोहरा पाना दूर की कौड़ी लगती है.