नई दिल्ली: मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, जिंदगी सिलसिला है, आज कल की नहीं… मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं. लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं? ये पंक्तिया पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कविता की हैं. मन से कवि, कर्म से राजनेता और विचार से क्रांतिकारी वाजपेयी ने गुरुवार अंतिम सांस ली. वह 11 जून से दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती थे. बुधवार की शाम से उनकी तबीयत में अचानक गिरावट देखने को मिला, जिसके बाद उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था.
मजबूत विपक्षी राजनेता
अटल बिहारी वाजपेयी प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक के कार्यकाल तक में एक मजबूत विपक्षी राजनेता के तौर पर दिखे. विपक्ष में रहते हुए उन्होंने सरकार की कमियों की जहां डटकर आलोचना की, वहीं सरकार की उपलब्धियों की भी तारीफ करने में कभी पीछे नहीं रहे. शायद इसी वजह से उन्हें राजनीति का ‘अजातशत्रु’ कहा जाता रहा. जवाहर लाल नेहरू ने उनकी तारफी की तो इंदिरा ने भी उन्हें बराबर सम्मान दिया. कहा जाता है कि राजीव गांधी ने तो उन्हें इलाज के लिए विदेश तक भेजा था. लोहिया से लेकर जयप्रकाश नारायण और राजनारायण तक अटल की हमेशा तारीफ करते रहे थे.
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अटल ने हमेशा देश सर्वोपरि के सिद्धांत पर काम किया. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, जनसंघ होते हुए उन्हें बीजेपी की स्थापना की. इतना ही नहीं दो सीट से केंद्र मे सरकार बनाने तक में पार्टी के चेहरा अटल ही रहें. जिस तरह से अटल विपक्ष में मजूबती से रहे, उसी तरह मजबूत से उन्होंने सरकार भी चलाई. पोखरण परमाणु परीक्षण हो या फिर कारगिल युद्ध. अटल के नेतृत्व को दुनिया ने देखा है. अपने 50 साल के सामाजिक-राजनैतिक जीवन में अटल कभी डिगे नहीं और थके भी तब जब स्वास्थ्य ने पूरी तरह से साथ देना छोड़ दिया.
एक भारत की तस्वीर दिखाई
अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के वह चेहरा थे जिन्होंने एक भारत की तस्वीर दिखाई. एक पत्रकार, एक कवि, एक स्वयंसेवक, एक कार्यकर्ता, एक बीजेपी नेता, एक विपक्षी नेता, सरकार में एक मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक के दायित्वों में उन्होंने एक ऐसी क्षमता दिखाई, जो भारत निर्माण में महत्वपूर्ण रहा. नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक ने अटल का कार्यप्रणाली की तारीफ की. अटल के देहांत से एक ऐसे सूर्य के अस्त हो गया है, जिसने पूरे जीवन अलग-अलग क्षेत्रों में रोशनी ही फैलाई है. भारतीय राजनीति का वह चेहरा आज अस्त हो गया, जिसने लोकतंत्र की गरिमा को हमेशा बरकरार रखा.
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अटल बिहारी वाजपेयी वैसे तो साल 2005 के बाद से ही सक्रिय राजनीति से दूर हो गए थे. लेकिन उनकी मौजूदगी ही बीजेपी या यूं कह लें भारतीय राजनीति के लिए एक स्तंभ के तौर पर दिखता रहा. वह एक ऐसे नेता हैं जो एक दशक से ज्यादा समय से घर पर रहने के बाद भी भारतीय जनमानस में वैसे ही बसे हुए हैं जैसे वह सक्रिय अवस्था में रहे.
अटल बिहारी वाजपेयी को 11 जून को किडनी, छाती और यूरिन में इन्फेक्शन होने की शिकायत पर एम्स में भर्ती करवाया गया था. 93 साल के हो चुके वाजपेयी को 2009 में भी एक स्ट्रोक पड़ चुका था. एम्स के डॉयरेक्टर डॉ रणदीप गुलेरिया वाजपेयी की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए थे. उनके नेतृत्व में टीम उनकी हर स्थिति की लगातार जांच कर रही थी. डॉ. गुलेरिया पिछले 30 साल से वाजपेयी का इलाज कर रहे थे. बता दें कि साल 2004 के बाद वाजपेयी की हालत लगातार बिगड़ती गई. इस दौरान उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक जीवन से भी दूरी बना ली थी. वह घर पर ही रहने लगे. बाद के दिनों में वह सिर्फ कुछ लोग से ही मिलने लगे.
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