नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन ने बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को सबसे ज्यादा गमगीन किया है . 90 साल के आडवाणी अटल के सबसे करीबी साथी रहे. दोनों ने सात दशक तक कंधे से कंधा मिलाकर पहले जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी के लिए काम किया. अटल और आडवाणी के बीच उम्र का अंतर तीन साल का था. दोनों नेता बहुत करीबी दोस्त रहे और करीब 7 दशक तक एक दूसरे के साथी रहे. दोनों का एक दूसरे के प्रति बहुत सम्मान रहा. हालांकि, दोनों का स्वभाव अलग किस्म का था. दोनों के अपने अपने कैंप फॉलोअर रहे. कई मुद्दों पर दोनों के बीच मतभेद रहे. दोनों का राजनीतिक स्टाइल, सामाजिक आचरण और विचारों ने उनकी सियासी यात्रा को अलग आयाम दिया.

सबसे यादगार साझेदारी

अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के संबंध को भारतीय सियासत के इतिहास में सबसे यादगार साझेदारी के तौर पर देखा जा सकता है. दोनों ही आरएसएस से जुड़े हुए थे और इस विचार पर एकमत थे कि हिंदु समाज को एक होना चाहिए. दोनों को साहित्य, पत्रकारिता और सिनेमा में रुचि थी. जब संघ ने 1951 में अपना राजनीतिक दल जनसंघ बनाया तो दोनों नेता इसमें शामिल हुए. दोनों नेताओं ने अथक मेहनत से जनसंघ को स्थापित करने में सबसे बड़ा योगदान दिया.

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वाजयेपी ने जनसंघ को संभाला

हालांकि, वाजपेयी ज्यादा सीनियर नेता और पार्टी के स्टार सांसद थे और दीनदयाल उपाध्याय के बाद जनसंघ को संभाला. इसके बाद आडवाणी ने भी उनका साथ देना शुरू किया. इमरजेंसी के दौरान दोनों को जेल जाना पड़ा था. दोनों ने मिलकर जनसंघ का विलय जनता पार्टी में करने का फैसला लिया था जिसने कांग्रेस को सत्ता से हटा दिया था. उस सरकार में वाजपेयी विदेश मंत्री बने. आडवाणी को सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाया गया.

दोनों ने मिलकर बनाई बीजेपी

लेकिन जब सवाल आया कि अटल-आडवाणी संघ के प्रतिनिधि हैं या जनता पार्टी के, तब दोनों ने अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया. वाजपेयी इस पार्टी के पहले अध्यक्ष बने. हालांकि, स्थापना के कुछ सालों तक बीजेपी को करारी चुनावी हार का सामना करना पड़ा था.

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80 के दौर में चमके आडवाणी

80 के दौर में पार्टी की कमान आडवाणी के हाथ में आ गई जिसके बाद पार्टी हिदुत्व को लेकर आक्रमक हो गई और बीजेपी का विस्तार होना शुरू हो गया. इस दौर में वाजपेयी पर्दे के पीछे चले गए. वह भी अयोध्या में राम मंदिर बनाने के पक्ष में रहे लेकिन जिस अंदाज में 1992 में बाबरी ढांचे को ढहाया गया उससे वह सहमत नहीं थे. ये वो दौर था जब आडवाणी ने पूरी एक पीढ़ी के राजनीति का ककहरा सिखाया.

दोनों का रहा एक ही लक्ष्य

लेकिन दोनों के रिश्तों में कोई फर्क नहीं आया. दोनों के लक्ष्य एक ही थे. कोई मतभेद नहीं था और इसका सबूत ये था कि चुनाव में वाजपेयी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था. वहीं, 1996 में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार बनी तो पीएम वाजपेयी ही बने. आडवाणी को डिप्टी पीएम का पद मिला. दोनों नेता सत्ता का दो प्रमुख केंद्र बने. दोनों के बीच का रिश्ता बेहद सौहार्द्रपूर्ण रहा और कभी कोई मतभेद सामने नहीं आया. डिप्टी पीएम रहते हुए आडवाणी की तरफ से कभी मतभेद का कोई संकेत नहीं मिला. दोनों के बीच ये रिश्ता वाजपेयी के 2004 में राजनीति से संन्यास लेने तक जारी रहा.