सबके दिलों पर अमिट छाप छोड़ गए अटल बिहारी वाजपेयी, पहली बार 13 दिन के लिए बने पीएम

कैसी रही वाजपेयी सरकार की उपलब्धियां, विस्तार से बता रहे हैं.

Published date india.com Updated: August 16, 2018 6:06 PM IST
सबके दिलों पर अमिट छाप छोड़ गए अटल बिहारी वाजपेयी, पहली बार 13 दिन के लिए बने पीएम
File Photo
नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पहले ऐसे गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा किया था. उन्होंने 1999 से 2004 तक एनडीए की सरकार चलाई और कई उपलब्धियां अपने और सरकार के नाम दर्ज कीं. वाजपेयी पहले मात्र 13 दिन के लिए पीएम रहे और फिर पूरे पांच साल के लिए उन्होंने पीएम पद को संभाला. इन कुछ सालों में कैसी रही वाजपेयी सरकार की उपलब्धियां, विस्तार से बता रहे हैं.
1996 में पीएम बने, 13 दिन चली सरकार
1984 चुनाव तक बीजेपी ने खुद को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दल के रूप में स्थापित कर लिया था. 1996 के चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और वाजपेयी को देश के 10वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई. लेकिन संसद में वह जरूरी बहुमत नहीं जुटा सके और मात्र 13 दिनों के बाद उनकी सरकार गिर गई. इस तरह वह महज 13 दिनों तक ही प्रधानमंत्री रह सके जो भारतीय राजनीति के इतिहास में किसी पीएम का सबसे छोटा कार्यकाल था.
1998 में 13 महीने चली सरकार 
लेकिन 1998 के चुनाव में जनता ने फिर बीजेपी को मौका दिया और एनडीए सरकार का गठन हुआ. वाजपेयी को दोबारा पीएम पद की शपथ दिलाई गई. उनका दूसरा कार्यकाल मई 1998 में राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण के लिए याद किया जाता है. इसी के साथ उन्होंने पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता भी चलाई. उन्होंने पाकिस्तान के साथ कश्मीर विवाद सुलझाने की दिशा में भी पहल की. लेकिन पाकिस्तान ने करगिल युद्ध छेड़कर भारत को धोखा दिया. भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय चलाकर दुर्गम चोटियों पर दोबारा कब्जा जमाकर पाकिस्तान और दुनिया को अपनी ताकत बता दी. लेकिन वाजपेयी सरकार 13 महीने ही चल सकी क्योंकि 1999 के मध्य में एआईएडीएमके ने एनडीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया. इस बार भी वाजपेयी के लिए 13 अंक अशुभ साबित हुआ. पहले 13 दिन और अब 13 महीने.
1999 से चलाई 5 साल सरकार 
1999 में हुए चुनाव में जनता ने एक बार फिर बीजेपी और एनडीए को मौका दिया. अटल बिहारी वाजपेयी ने तीसरी बार 13 अक्टूबर 1999 को देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. इस बार ये सरकार पूरे पांच साल चली और ये पहली गैर कांग्रेसी सरकार थी जिसने 1999-2004 तक अपना कार्यकाल पूरा किया.
आतंकी घटनाओं से मिली चुनौती
वाजपेयी के तीसरे कार्यकाल में सरकार को कई चुनौतियों से गुजरना पड़ा. दिसंबर 1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC 814 को काठमांडू से नई दिल्ली आत समय हाइजैक कर लिया. आतंकी इस प्लेन को अफगानिस्तान के कंधार ले गए. यात्रियों के बदले वाजपेयी सरकार को मौलाना मसूद अजहर सहित 5 बड़े आतंकी छोड़ने पड़े.
कई आर्थिक सुधार काम चलाए
लेकिन इसी कार्यकाल में वाजपेयी सरकार ने कई आर्थिक सुधार के कई कार्यक्रम चलाए जिससे अर्थव्यवस्था में गति आई. प्राइवेट सेक्टर और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया गया. इस दौरान नेशनल हाईवे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना सफलतापूर्वक चलाई गई. वाजपेयी सरकार ने बिजनेस फ्रेंडली, मुक्त बाजार सुधार कार्यक्रम चलाए जिससे इकोनॉमी में सुधार आया.
पाक के साथ संबंध सुधारने की कोशिश
वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की भी पुरजोर कोशिश की. करगिल में धोखा खाने के बावजूद उन्होंने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को आगरा समिट के लिए बुलाया और जमकर आवाभगत की. लेकिन ये बातचीत नाकाम हो गई क्योंकि मुशर्रफ ने कश्मीर मुद्दे को एक तरफ करने से साफ इनकार कर दिया.
संसद पर हमला
वाजपेयी सरकार देश में आतंकी घटनाओं से भी जूझती रही. भारतीय इतिहास में सबसे बड़े आतंकी हमलों में से एक वाजपेयी सरकार में ही हुआ. 13 दिसंबर 2001 को आतंकियों ने सीधे संसद पर हमला बोल दिया. पाकिस्तान समर्थित आतंकी संसद परिसर में घुस आए. उन्होंने अंधाधुंध गोलीबारी कर कई सुरक्षाकर्मियों और कर्मचारियों को मार डाला. लेकिन अंत में सुरक्षाकर्मियों ने सभी आतंकियों को ढेर कर दिया. इसी सरकार में 2002 में भयंकर गुजरात दंगा भी हुआ जिसकी शुरुआत गोधरा में कारसेवकों की ट्रेन जलाने के बाद हुई थी. दंगे में सैकड़ों लोगों की मौत हुई. इसी दौरान वाजपेयी ने गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी को राजधर्म निभाने की सलाह दी थी.
राजनीति से संन्यास 
2004 के चुनाव में बीजेपी को करारा झटका लगा. जनता ने एनडीए के इंडिया शाइनिंग नारे को पूरी तरह खारिज कर दिया. एनडीए की आधी सीटें कम हो गई और कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सत्ता में आ गई. वाजपेयी ने लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद लेने से इनकार कर दिया और लालकृष्ण आडवाणी के लिए रास्ता साफ कर दिया. इस तरह उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया और राजनीति की चकाचौंध और गहमागहमी से दूर अपने घर पर समय बिताने लगे.

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