Opinion: मोदी-योगी के मुकाबले नया समीकरण? अविमुक्तेश्वरानंद के साथ मुस्लिम नेताओं की बढ़ती नजदीकियों पर उठे सवाल
उत्तर प्रदेश में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गोरक्षा यात्रा के दौरान मुस्लिम नेताओं की बढ़ती भागीदारी नई राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दे रही है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये सामाजिक बदलाव है या फिर बीजेपी के प्रभाव को चुनौती देने की नई रणनीति.
Opinion: उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक नया और दिलचस्प समीकरण चर्चा का विषय बना हुआ है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गोरक्षा यात्रा को लेकर जिस तरह अलग-अलग क्षेत्रों में मुस्लिम नेताओं और संगठनों की सक्रियता दिखाई दे रही है, उसने राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनता तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं. खास बात ये है कि गोरक्षा और गौमाता जैसे मुद्दे लंबे समय से भारतीय राजनीति में वैचारिक और सांस्कृतिक बहस के केंद्र रहे हैं, लेकिन अब इन विषयों पर नए राजनीतिक समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं.
बीते कुछ सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजनीति का प्रमुख आधार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, धार्मिक विरासतों का पुनरोद्धार और गोरक्षा जैसे मुद्दे रहे हैं. राम मंदिर निर्माण से लेकर काशी और मथुरा से जुड़े विषयों तक, भाजपा ने हिंदुत्व आधारित राजनीति को अपनी ताकत के रूप में स्थापित किया है. ऐसे में जब अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा के दौरान मुस्लिम समुदाय के कुछ प्रभावशाली चेहरे खुलकर समर्थन करते दिखाई देते हैं, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में सवाल उठते हैं.
यात्रा के कई पड़ावों पर मुस्लिम समाज द्वारा स्वागत, फूल वर्षा और स्थानीय नेताओं की भागीदारी ने राजनीतिक पर्यवेक्षकों का ध्यान आकर्षित किया है. इसके साथ ही कुछ विपक्षी दलों के नेताओं की मौजूदगी ने इस चर्चा को और बल दिया है कि क्या यह सिर्फ सामाजिक सद्भाव का संदेश है या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक रणनीति काम कर रही है.
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि विपक्ष लंबे समय से बीजेपी के हिंदुत्व एजेंडे का प्रभावी जवाब तलाश रहा है. ऐसे में यदि कोई धार्मिक चेहरा बीजेपी की नीतियों पर सवाल उठाता है और उसे विभिन्न सामाजिक वर्गों का समर्थन मिलता है, तो यह विपक्ष के लिए एक अवसर के रूप में देखा जा सकता है. हालांकि ये धारणा कितनी सही है, इसका साफ जवाब अभी भविष्य के राजनीतिक घटनाक्रम ही दे पाएंगे.
दूसरी तरफ, कुछ लोग इसे सामाजिक संवाद और सहभागिता के रूप में भी देख रहे हैं. उनका तर्क है कि अगर किसी धार्मिक या सांस्कृतिक अभियान में विभिन्न समुदायों के लोग शामिल होते हैं, तो इसे केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. बदलते सामाजिक परिवेश में कई बार ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं जो पारंपरिक राजनीतिक धारणाओं से अलग होते हैं.
फिर भी ये नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा के दौरान दिए गए कई राजनीतिक बयान और सरकार की नीतियों पर लगातार हो रहे हमले इस अभियान को पूरी तरह धार्मिक दायरे में सीमित नहीं रहने देते. यही कारण है कि यात्रा के राजनीतिक प्रभाव और उसके संभावित परिणामों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं.
आने वाले समय में यह साफ होगा कि ये घटनाक्रम केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित राजनीतिक गतिविधि है या फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी बड़े बदलाव का संकेत. फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा ने प्रदेश की राजनीतिक बहस को नया विषय दे दिया है और इसके असर पर सभी की नजर बनी हुई है.
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)
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