नई दिल्ली: ईद-उल-फितर के करीब दो महीने के बाद ईद-उल-अजहा का त्योहार मनाया जाता है. यह इस्लाम धर्म को मानने वालों के लिए प्रमुख त्योहार है जिसे बकरीद के नाम से जाना जाता है. इस साल यह त्योहार 2 सितंबर यानि आज मनाया जा रहा है. बकरीद के दिन मुस्लिम समुदाय के लोग मस्जिद में ईद की नमाज अदा करने के बाद कुर्बानी देते हैं.Also Read - Eid Ul Fitr: कोरोना महामारी के बीच ईद-उल-फितर की नमाज, कहीं नियम मानें तो कहीं उड़ाई धज्जियां

इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक ईद-उल-अजहा 12वें महीने धू-अल-हिज्जा के 10वें दिन मनाई जाती है. बकरीद का त्योहार केवल बकरों की कुर्बानी देने का ही नाम नहीं हैं , बल्कि कुर्बानी का मकसद है अल्लाह को राजी करने के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज को भी त्याग कर देना है.  इसी दिन दुनिया भर के मुसलमान अरब पहुंच कर हज करते हैं. हज की वजह से भी इस पवित्र त्योहार की अहमियत बढ़ जाती है. यह भी पढ़ें:  इस ईद को बनाएं और भी खास, भेजें ये व्हाट्सएप और फेसबुक संदेश Also Read - Aadhaar PVC Card: जानिए-UIDAI ने एक ही मोबाइल नंबर से पूरे परिवार के लिए क्यों शुरू की आधार कार्ड ऑर्डर करने की ऑनलाइन सुविधा

अल्लाह को राजी करने के लिए जानवरों की कुर्बानी देना तो जरिया है जबकि अल्लाह को कुर्बानी का गोश्त नहीं पहुंचता है, वह तो केवल कुर्बानी के पीछे बंदों की नीयत को देखता है. अल्लाह को पसंद है कि बंदा उसकी राह में अपना हलाल तरीके से कमाया हुआ धन खर्च करे. कुर्बानी का सिलसिला ईद के दिन को मिलाकर तीन दिनों तक चलता है. Also Read - नेशनल कॉन्फ्रेंस का दावा- फारूक अब्दुल्ला को नमाज पढ़ने के लिए घर से बाहर जाने से रोका गया

इस्लाम के मुताबिक, अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए उन्हें अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने का हुक्म दिया था. हजरत इब्राहिम को लगा कि उन्हें सबसे प्यारा तो उनका बेटा है इसलिए उन्होंने अपने बेटे की ही बलि देने का फैसला किया.

हजरत इब्राहिम को लगा कि कुर्बानी देते समय उनकी भावनाएं आड़े आ सकती हैं, इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी. लेकिन जब कुर्बानी देने के बाद उन्होंने अपनी आंखों पर से पट्टी हटाई तो देखा कि उनका बेटा जिंदा है और उनके सामने जिंदा खड़ा है. उन्होंने देखा कि बेटे की जगह दुम्बा (साउदी में पाया जाने वाला भेंड़ जैसा जानवर) पड़ा हुआ था, तभी से इस मौके पर कुर्बानी देने की प्रथा है.