9वीं सदी का मंदिर 'भोगनंदीश्वर', इसकी दीवारें कह रही हैं नोलंब वंश की कहानी

कर्नाटक के चिक्काबल्लापुर जिले के नंदी हिल्स यानी नंदी गांव में स्थित शिव के भोगनंदीश्वर मंदिर का निर्माण नोबंब वंश के राजा बाना-विद्याधारा की पत्नी रत्नावली ने 800 सीई में कराया था.  

Published date india.com Updated: December 30, 2024 6:27 PM IST
9वीं सदी का मंदिर 'भोगनंदीश्वर', इसकी दीवारें कह रही हैं नोलंब वंश की कहानी

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से लगभग 60 किलोमीटर दूर नंदी पहाड़ियों की तलहटी में भगवान शिव का 1000 साल से भी पुराना मंदिर है. 9वीं सदी में बनाए गए इस मंदिर का नाम भोगानंदीश्वर है. हालांकि यह मंदिर पुरातत्व विभाग की देखरेख में चल रहा है. इस मंदिर के प्रवेशद्वार पर ही भारतीय पुरातत्व विभाग का बोर्ड भी लगा है, लेकिन मंदिर का परिसर पूरी तरह जर्जर है जो अपनी बुलंदी की कहानी को हर ईंट से चीख-चीख कर बता रहा है कि यह भारतीय संस्कृति का अद्भुत नमूना है.

सांस्कृतिक धरोहर की निशानी

विविधता से भरे हमारे देश में प्राचीन मंदिरों की समृद्ध परंपरा देखने को मिलती है. इन मंदिरों का सिर्फ धार्मिक महत्व ही नहीं है, बल्कि ये हमारे सांस्कृतिक धरोहर भी हैं जहां से हमारे समृद्ध इतिहास की जानकारी भी मिलती है. कर्नाटक के चिक्काबल्लापुर जिले के नंदी हिल्स यानी नंदी गांव में स्थित शिव के इस मंदिर के साथ दो और मंदिर भी हैं. मंदिर के उत्तर दिशा में भगवान शिव का भोगानंदीश्वर मंदिर है तो दक्षिण में अरुणाचलेश्वर. स्थापत्य शैली और द्रविड़ियन शैली में बने इस मंदिर के प्रवेश द्वार से ही कला का अद्भुद्ता देखने को मिलती है.

परिसर में जगह-जगह छोटे-छोटे मंदिर बने हैं, जहां सुबह की पूजा हो चुकी थी और सभी मंदिर के पास द्वीप प्रज्वलित थे. परिसर में नया और पुराना रथ रखा हुआ था. पुराने रथ के चारों ओर नक्काशी की हुई थी. पुराने रथ को देख कर यह नहीं पता चलता कि पुराना रथ कितना पुराना है..क्या यह भी 15 वीं या 19वीं शताब्दी का है?

जर्जर हो चुके भव्य इमारत

जर्जरता से घिरे मंदिर की इमारत कह रही है कि मंदिर कितना विशाल रहा होगा. परिसर में दो बड़े मंदिर हैं: दक्षिण में तलकड़ के गंगा द्वारा निर्मित ‘अरुणाचलेश्वर’ मंदिर, और उत्तर में चोलों द्वारा निर्मित ‘भोग नंदीश्वर’ मंदिर. इसमें एक राजा की मूर्ति है, जिसे राजेंद्र चोल की मूर्ति बताई जा रही है. वहीं मंदिर परिसर में प्रवेश के साथ बीच में एक छोटा सा मंदिर मिलता है, जिसपर ‘उमा-महेश्वर’ लिखा है. प्रांगण में एक कल्याण मंडप है, जो काले पत्थर से सुसज्जित है, मंदिर परिसर में लगे हर खंबे में हिंदू देवताओं शिव, पार्वती, ब्रह्मा सहित कई देवी देवताओं के चित्र उकेरे गए हैं. सरस्वती, विष्णु, लक्ष्मी, अग्नि के देवता, पत्नी स्वाहा देवी, और बेस-रिलीफ में सजावटी लताएं और पक्षी आदि भी इन खंबो पर उकेरा गया है. बताते हैं कि यह होयसला वास्तुकला की विशेषता है.

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परिसर के खंबे जितनी कशीदाकारी दिखाई देती है वहीं मंदिर परिसर में शिवलिंग है जो बहुत पुराना नहीं दिखता है. हां, मंदिर परिसर के बाहरी क्षेत्र हो या अंदर का नंदी की मूर्ति तुलसी के साथ या फिर नवग्रह की मूर्ति के साथ लगी दिख जाती है. इसी परिसर में मां पार्वती का मंदिर भी है जिसे गिरिजाम्ब मंदिर कहते हैं. मंदिर की दीवारें तो इतिहास की गवाही देती हैं, लेकिन मूर्ति देखकर पुराना कहना थोड़ा मुश्किल है.

बानास से विजयनगर तक 4 साम्राज्यों ने संभाला मंदिर

9वीं सदी में इस मंदिर को कर्नाटक के सबसे पुराने मंदिरों में से एक कहा गया है. भारतीय पुरातत्व विभाग ने अपने शिलालेख में लिखा है कि इस मंदिर का निर्माण करने वाले सबसे पुराने शिलालेख में नोलंब वंश के शासक नोलांबदीराजा और सम्राट गोविंदा 3 का उल्लेख मिलता है जो लगभग 806 का है. इसमें यह भी उल्लेख मिलता है कि मंदिर का निर्माण राजा बाना-विद्याधारा की पत्नी रत्नावली ने 800 सीई में कराया था. इस मंदिर को फिर बानास साम्राज्य, चोला साम्राज्य, होयसला साम्राज्य और फिर विजनगर साम्राज्य के संरक्षण में निर्मित किया गया. बाद में मैसूर साम्राज्य में हैदर अली और टीपू सुल्तान ने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया. 1799 में टीपूर सुल्तान की मृत्यु के बाद यह ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया था.

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