बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में कौन बाजी मारेगा यह तय होने में अभी काफी समय बचा हुआ है। लेकिन उससे पहले कई तरह के कयास लगाये जा रहे है। जिसे जानना बेहद ही जरुरी है। हालांकि इसे लेकर अटकलों का बाजार भी गर्म है। बिहार में दोनों गठबंधनों के बीच बराबर की टक्कर दिखाई दे रही है। जिसमे महागठबंधन और बीजेपी गठबंधन का समावेश है। बावजूद इसके लोगो की नजर ओवैसी पर है।

बता दे कि ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (AIMIM) चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने ऐलान किया है कि उनकी पार्टी इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में उतरेगी। ओवैसी ने शनिवार को बताया कि उनकी पार्टी केवल सीमांचल (पूर्णिया, सहरसा, किशनगंज, मधेपुरा, कटिहार, अररिया आदि) इलाके में चुनाव लड़ेगी, जिसके बाद से ही सूबे के सियासी गलियारे में हलचल तेज हो गई है। यह भी पढ़े-बिहार विधानसभा चुनाव 2015: मांझी के HAM में हंगामा, देवेंद्र यादव ने छोडी पार्टी कहा सीटें नहीं, खैरात मिली

हालांकि एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार चुनाव की घोषणा से पहले ही वहां चार रैलियां और चार सरकारी कार्यक्रम कर चुके हैं।

नीतीश-लालू के महागठबंधन ने भी पटना में बड़ी रैली कर चुनावी आकलन में संशोधन की जरूरत जता दी। फिर भी बिहार में किसी से भी बात कीजिए, सबको इंतज़ार है उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की।

यह चुनाव कांटे की टक्कर में तब्दील होता दिखाई दे रहा है। ऐसे में ओवैसी के महज सीमांचल में चुनाव लड़ने की घोषणा से सियासी हलचल का बढ़ जाना स्वाभाविक ही है। यह भी पढ़े-बिहार चुनाव : ओवैसी के दस्तक से बदलेगा समीकरण!

आखिर सीमांचल ही क्यों?
ओवैसी के बिहार के सीमांचल में चुनावी मैदान में कूदने की वजह को समझना भी यहां काफी जरूरी हो जाता है। दरअसल सीमांचल की कुल आबादी तकरीबन एक करोड़ है और इसमें मुसलमानों की आबादी 40 फीसदी है। अकेले किसनगंज में 69 फीसदी मुसलमान हैं। यह जिला इसलिए भी खास है क्योंकि यहां लंबे समय से अल्पसंख्यक राजनीति फलती-फूलती रही है। सीमांचल बिहार का वह इलाका है जहां से राज्य की 243 में से 24 सीटें आती हैं। हालांकि भाजपा इस क्षेत्र में अधिकतर सीटों पर कब्जा करने का दावा कई बार कर चुकी है।

जिस सीमांचल में ओवैसी इस वक्त अपने उम्मीदवार उतारना चाहते हैं उसमें कुल 24 विधानसभा सीटें आती हैं। इन 24 विधानसभा सीटों का 2010 का आंकड़ा देखना भी दिलचस्प होगा। इस मुस्लिम बहुल बेल्ट में सबसे अधिक सीट बीजेपी को 13, तो जेडीयू को 4, एलजेपी को 2, कांग्रेस को 3, आरेजडी को 1 और एक सीट निर्दलीय को भी गई थी। 2014 लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद BJP इन सीमांचल की 7 सीटों पर खाता भी नहीं खोल पाई थी। जबकि NDA को बिहार में 40 में से 31 सीटें मिली थीं। लोकसभा चुनाव में भी अररिया से RJD के तसलीमुद्दीन और कटिहार से NCP के तारिक अनवर जीते थे। यह भी पढ़े-बिहार चुनाव को केंद्र सरकार ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया : नीतीश

कौन हैं ओवैसी?
आंध्र प्रदेश के हैदराबाद ओल्ड सिटी में करीब 40 सालों से भी ज्यादा वक्त से ओवैसी परिवार का राजनीतिक दबदबा बना हुआ है। सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी द्वारा शुरू की गई मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन पार्टी ने हैदराबाद ओल्ड सिटी को अपना गढ़ बना लिया है। बढ़ती हुई लोकप्रियता के साथ साथ सलाउद्दीन ओवैसी “सलार-ए-मिल्लत” (मुसलमानों के नेता) के नाम से मशहूर हुए।

गौरतलब है कि वर्ष 1984 में वो पहली बार हैदराबाद से लोकसभा के लिए चुने गए, साथ ही विधानसभा में भी उनकी पार्टी के सदस्यों की संख्या बढ़ती गई। हालांकि कई बार इस पार्टी पर एक सांप्रदायिक दल होने के आरोप लगे। लेकिन आंध्रप्रदेश की बड़ी राजनैतिक पार्टियां कांग्रेस और तेलुगुदेसम दोनों ने अलग अलग समय पर उससे गठबंधन बनाए रखा। यह भी पढ़े-जानिये बिहार में कब-कब होंगे मतदान

सलाउद्दीन ओवैसी की राजनीतिक विरासत को उनके दो बेटे असदउद्दीन और अकबरूद्दीन ओवैसी बखूबी संभाल रहे हैं। दोनों भाई अपने पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए मुसलमानों का मसीहा बनने की कोशिश करते दिखते हैं।

असदउद्दीन ओवैसी सांसद हैं और अकबरूद्दीन ओवैसी विधायक हैं। अकबरूद्दीन को ओल्ड सिटी का बाहुबली माना जाता है। अकबरूद्दीन ओवैसी हमेशा अपने भड़काऊ बयानों को लेकर चर्चा में बने रहते है। अकबरूद्दीन ओवैसी के पिता सलाउद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद ओल्ड सिटी में पत्तार्गुत्टी से चुनाव लड़ा था और बाद में हमेशा ओल्ड सीटी से चुनाव लड़ते और जीतते रहे। यह भी पढ़े-बिहार चुनाव : मोदी के लिए कड़ी परीक्षा

क्या है AIMIM पार्टी का इतिहास?
AIMIM को 1936 में नवाब नवाज किलेदार ने शुरू किया था जब हैदराबाद एक स्वतंत्र राज्य था और वहां नवाबों का शासन था। उस वक़्त मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन केवल एक सांकृतिक अंग था, लेकिन बाद में यह मुस्लिम लीग के साथ जुड़ने के बाद पूरी तरह से एक राजनितिक संगठन में बदल गया और उसके बाद राजनीतिक पार्टी में।

मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन उस वक़्त अलग मुस्लिम राज्य के लिए मुस्लिम लीग के साथ रहा। एमआईएम पार्टी का हैदराबाद के रजाकारों (स्वयंसेवकों) से गहरा रिश्ता रहा है और रजाकार हमेशा हैदराबाद रियासत को भारत में शामिल करने के खिलाफ थे और यही वजह है 1948 से 1957 तक एमआईएम को बैन किया गया था।

ओवैसी परिवार के हाथ में पार्टी की बाग़डोर उस समय आई जब 1957 में इस संगठन पर से बैन हटाया गया। 1957 में इस पार्टी ने अपने नाम में “ऑल इंडिया” जोड़ा और साथ ही अपने संविधान को बदला। यह भी पढ़े-बिहार विधानसभा: पांच चरणों में होगा चुनाव, 8 नवंबर को आयेंगे नतीजे

AIMIM ने अपनी पहली चुनावी जीत 1960 में दर्ज की जबकि सलाहुद्दीन ओवैसी हैदराबाद नगर पालिका के लिए चुने गए और फिर दो वर्ष बाद वो विधानसभा के सदस्य बने तब से मजलिस की शक्ति लगातार बढ़ती गई। 2009 के चुनाव में AIMIM ने विधानसभा की सात सीटें जीतीं जोकि उसे अपने इतिहास में मिलने वाली सब से ज्यादा सीटें थीं। यह भी पढ़े-असदुद्दीन ओवैसी को लेकर लालू-रघुवंश आमने-सामने

वही महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2015 में इस पार्टी के दो विधायक जीते, जिसमे मुंबई की भायखला सीट से वारिस पठान और औरंगाबाद सीट से इम्तियाज़ जलील का समावेश है। वही महाराष्ट्र के नांदेड़ नगर पालिका में 11 सीटें जीत कर हलचल मचा दी। साथ ही औरंगाबाद महानगरपालिका चुनाव में इस पार्टी को 25 सीटें मिली। जिसके बाद से इस पार्टी की चर्चा चारो तरफ होने लगी