नई दिल्ली. छायावादी युग की प्रमुख स्तंभों में से एक महादेवी वर्मा की आज जयंती है. आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण कवि निराला ने उन्हें ‘हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती’ भी कहा है. उन्हें साहित्य की उस पंक्ति में रखा जाता है, जिनके रचनाकारों ने व्यापक समाज में काम करते हुए हाहाकार, रुदन को देखा, परखा और करुण होकर अंधेरे को दूर करने वाली दृष्टि देने की कोशिश की. बचपने से ही संवेदनशीलता उनके घर कर गई थी. उनके लेखन में पशु-पक्षियों के लिए इसी करुणा को देखा जा सकता है.Also Read - India vs New Zealand, 1st Test: अर्धशतक जड़ने के बावजूद पांचवें दिन विकेटकीपिंग करने नहीं उतरे साहा

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‘मेरा परिवार’ नामक अपनी एक किताब में वह लिखती भी हैं, ‘स्मृति यात्रा में पशु-पक्षी ही मेरे प्रथम संगी रहे हैं, किन्तु इसे दुर्योग्य ही कहा जाएगा कि मनुष्य ने उनसे यह प्राथमिकता अनायास छीन ली.’ इसी पुस्तक की भूमिका में महादेवी ने एक मुर्गी के बच्चे की कहानी का जिक्र किया है, जिसमें वह उसे हॉस्टल के वार्डन से बचाने और उसे वापस उसके परिवार तक पहुंचाने की कहानी बताती हैं. यह पूरी किताब ही एक तरह से प्रकृति और पशु-पक्षियों के प्रति उनके अगाध प्रेम को दिखाती है. अपनी ऐसी ही कहानियों के अलावा महादेवी वर्मा हिन्दी में कविताओं से ज्यादा जानी-पहचानी गईं. खासकर महिलाओं के संदर्भ में की गई उनकी रचनाएं आज भी मील का पत्थर मानी जाती हैं. आज हिन्दी के आकाश की इस संवेदनशील कवयित्री की जयंती पर पढ़िए उनकी प्रसिद्ध कविता, ‘नीर भरी दुख की बदली’. Also Read - भारत में जून-जुलाई में तबाही मचा सकता है कोरोना वायरस, अपने चरम पर होगा संक्रमण

मैं नीर भरी दुःख की बदली

मैं नीर भरी दुःख की बदली, स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,

क्रंदन में आहत विश्व हंसा, नयनो में दीपक से जलते,

पलकों में निर्झनी मचली! मैं नीर भरी दुःख की बदली!

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मेरा पग पग संगीत भरा, श्वांसों में स्वप्न पराग झरा,

नभ के नव रंग बुनते दुकूल, छाया में मलय बयार पली!

मैं नीर भरी दुःख की बदली!

मैं क्षितिज भृकुटी पर घिर धूमिल, चिंता का भर बनी अविरल,

रज कण पर जल कण हो बरसी, नव जीवन अंकुर बन निकली!

मैं नीर भरी दुःख की बदली!

पथ न मलिन करते आना पद चिह्न न दे जाते आना

सुधि मेरे आगम की जग में सुख की सिहरन हो अंत खिली!

मैं नीर भरी दुःख की बदली!

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विस्तृत नभ का कोई कोना मेरा न कभी अपना होना

परिचय इतना इतिहास यही उमटी कल थी मिट आज चली!

मैं नीर भरी दुःख की बदली!