
Gargi Santosh
गार्गी संतोष, जी मीडिया के India.com में सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. वह हाइपरलोकल, नेशनल और वर्ल्ड सेक्शन की जिम्मेदारी संभाल रही हैं. गार्गी को लाइफस्टाइल, हेल्थ, टेक्नोलॉजी, और ... और पढ़ें
किसी भी चुनाव में हिस्सा लेने से पहले राजनीतिक पार्टियां चुनाव आयोग को इस बात की जानकारी देती हैं कि उनके पास कितने पैसे हैं? ऐसा ही कुछ दिल्ली में इस साल हुए विधानसभा चुनाव में देखने को मिला. नतीजे आने के बाद, पता चला कि पार्टियों की आर्थिक स्थिति क्या है. इससे पता चलता है कि सत्ता और संसाधनों के मामले में राजनीतिक दलों के बीच कितना फर्क है?
केंद्र और अब दिल्ली की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (BJP) आर्थिक रूप से सबसे मजबूत पार्टी बनकर उभरी है. पार्टी के अलग-अलग खातों में सब मिलाकर 6,900 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि देखी गई. वहीं, देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर दिखाई दी, जिसके पास सब मिलाकर 53 करोड़ के आसपास की राशि है.
बीजेपी की इतनी बड़ी राशि यह दिखाती है कि पार्टी का संगठनात्मक ढांचा कितना मजबूत है और फंड जुटाने की क्षमता कितनी ज्यादा है. बता दें सत्ता में होने की वजह से पार्टी को बड़े दानदाता, कॉरपोरेट समर्थन और संगठित चंदा प्रणाली का लाभ मिलता है. जानकार कहते हैं कि मजबूत आर्थिक स्थिति का सीधा असर चुनावी तैयारियों, प्रचार, डिजिटल कैंपेन और जमीनी संगठन पर पड़ता है. यही वजह है कि बीजेपी लगातार चुनावों में आक्रामक रणनीति के साथ उतरती है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) के खातों में 580 करोड़ रुपये से अधिक की जमा राशि दर्ज की गई है, जो अपने आप में हैरान करने वाले आंकड़े हैं. खास बात यह है कि हाल के चुनावों में BSP का अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा, इसके बावजूद उसकी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत बनी हुई है. पार्टी का पारंपरिक समर्थक वर्ग और लंबे समय से बना फंड ढांचा आज भी पार्टी को आर्थिक रूप से संभाले हुए है.
दूसरे राजनीतिक दलों की बात करें, तो आम आदमी पार्टी (AAP) की केंद्रीय इकाई के पास 9.9 करोड़ रुपये की राशि दर्ज की गई है. वहीं वामपंथी दलों की स्थिति और भी कमजोर नजर आती है. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPM के पास करीब 4 करोड़ रुपये हैं, जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के खातों में मात्र 41 लाख रुपये की राशि दर्ज की गई. ये आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव बनाए रखने के लिए, आर्थिक संसाधन जरूरी हो चुका है.
बता दें बिहार में हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों के बाद अभी तक किसी भी पार्टी ने अपनी वित्तीय रिपोर्ट चुनाव आयोग को जमा नहीं कराई है. इससे वहां राजनीतिक दलों की आर्थिक स्थिति इस वक्त कैसी है इसको लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं हो पाई है.
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