नई दिल्ली. 10 सालों से सत्ता पर काबिज यूपीए को 2014 के चुनाव में धूल चटाकर केंद्र में धमाके से आने वाली भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व आजकल चिंता में जरूर होगा. क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के मुकाबले पार्टी की राज्य इकाइयों के सूरमा लगातार कमजोर पड़ते जा रहे हैं. मामला चाहे ताजा उपचुनावों वाले मध्यप्रदेश का हो, या एक महीने पहले राजस्थान में हुए लोकसभा की दो और विधानसभा की एक सीट का. या फिर गुजरात में 22 वर्षों से सत्ता पर काबिज रहने के बावजूद पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों का ही मुद्दा क्यों न हो, भाजपा का राज्य नेतृत्व लगातार कमजोर पड़ता दिख रहा है. और तो और महाराष्ट्र में बन रहा नया सियासी समीकरण पार्टी की राज्य इकाई की कमजोरी को ही दर्शाता है. ऐसे में 2019 के आम चुनाव की तैयारियों में लगी भारतीय जनता पार्टी की चिंता लाजिमी है, क्योंकि हालिया चुनाव परिणामों का आम चुनाव पर असर पड़ना स्वाभाविक है. Also Read - मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक के बाद बोले पीएम मोदी- बाढ़ से निपटने के लिए केंद्रीय-राज्य एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय हो

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लगातार 5 उपचुनावों में मिली शिवराज को हार, तो क्या फीका पड़ने लगा 'मामा' का जादू

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मध्यप्रदेश में पार्टी की हार से और चिंताजनक हुए हालात

एमपी की दो विधानसभा सीटों मुंगावली और कोलारस पर हुए चुनाव का परिणाम बुधवार को आए. इन दोनों ही सीटों पर कांग्रेस ने अपना कब्जा बरकरार रखा है. इस चुनाव में भाजपा की जीत के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत प्रदेश के दर्जनभर मंत्री, सांसद और कई केंद्रीय मंत्री भी कवायद कर रहे थे. चूंकि ये दोनों सीटें कांग्रेस के सांसद और अभी एमपी में भाजपा सरकार के खिलाफ जोर-शोर से मोर्चा खोले रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव वाली थीं, इसलिए भाजपा यहां से अपनी जीत के लिए और जोर लगा रही थी. सीएम चौहान ने तो कई जनसभाओं में जनता से यह अपील भी की थी कि सिर्फ पांच महीनों के लिए आप भाजपा को मौका दीजिए, अपेक्षाएं पूरी न हुईं तो आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को वोट नहीं दीजिएगा. लेकिन यह भावनात्मक अपील भी किसी काम न आई. इन दो सीटों को जीतकर कांग्रेस ने राज्य में 10 महीनों के भीतर लगातार 4 सीटों पर जीत दर्ज की है.

चित्रकूट और अटेर से साथ झाबुआ लोस सीट भी जीती थी कांग्रेस

कांग्रेस ने इसके पहले वर्ष 2017 में चित्रकूट और अटेर विधानसभा की सीटों पर अपना कब्जा जमाया था. इसके अलावा झाबुआ सीट पर हुए लोकसभा के उपचुनाव में भी कांग्रेस ने भाजपा को झटका दिया था. यह सीट पहले भाजपा के कब्जे में थी, लेकिन उपचुनावों में कांग्रेस ने इसे हथिया लिया. ये सभी चुनाव परिणाम करीब 15 साल से सूबे की सत्ता पर काबिज बीजेपी के लिए झटका देने वाले हैं. क्योंकि विपक्षी कांग्रेस लगातार इस बात का प्रचार कर रही है कि शिवराज सिंह चौहान की नीतियों में अब जनता का विश्वास नहीं रहा. कांग्रेस हर उस मुद्दे को भुनाने में लगी है जिससे भाजपा और उसके मुख्यमंत्री कमजोर हो रहे हैं. 2017 में मंदसौर में हुए किसानों के आंदोलन का मसला ऐसा ही है. मंदसौर में किसानों के आंदोलन के हिंसक होने के बाद पुलिस गोलीबारी में पांच किसानों की मौत हो गई थी. इस मामले को लेकर कांग्रेस लगातार कह रही है कि शिवराज सरकार किसान विरोधी है. गौरतलब यह भी है कि भाजपा की सहयोगी आरएसएस ने भी किसान आंदोलन के बाद पार्टी को चेताया था. आरएसएस सहयोगी, भारतीय किसान संघ (बीकेएस) और भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) दोनों ने सूबे में जमीन हालत से सरकार को अवगत कराया था. आरएसएस ने बताया था कि सरकार और जनता के बीच दुरी बढ़ रही है जिसका खामियाजा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है. ताजा उपचुनाव परिणाम इन्हीं चिंताओं की ओर इशारा करते हैं.

वसुंधरा राजे के खिलाफ भाजपा में उठे बगावती सुर, सीएम बदलने के लिए अमित शाह को पत्र

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राजस्थान में पार्टी के भीतर ही बगावत के उठे स्वर

मध्यप्रदेश विधानसभा उपचुनावों से पहले राजस्थान में लोकसभा की दो सीटों अलवर और अजमेर तथा भीलवाड़ा की विधानसभा सीट मांडलगढ़ में उपचुनावों के परिणाम पिछले ही महीने आए थे. इन तीनों ही सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा था. राजस्थान में भी इसी साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में उपचुनावों की हार ने पार्टी के भीतर खलबली मचा दी. राज्यस्तर के नेताओं ने जहां इन चुनावों में हार का ठीकरा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर फोड़ने की कोशिश की, वहीं कुछ स्थानीय नेताओं ने आलाकमान को चिट्ठी लिखकर प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन तक की मांग कर डाली. भाजपा की कोटा इकाई के ओबीसी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष अशोक चौधरी ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को चिट्ठी लिखकर कहा कि सीएम वसुंधरा राजे और प्रदेश अध्यक्ष की कार्यशैली से पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता नाराज हैं. इसलिए जल्द से जल्द पार्टी को प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की दिशा में सोचना चाहिए. चौधरी इतने पर ही निश्चिंत नहीं बैठे. अपने पत्र का जवाब न मिलने पर उन्होंने मीडिया के जरिए पार्टी आलाकमान को रिमाइंडर भी कराया. साथ ही चेतावनी भी दी कि अगर प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन नहीं होता है तो भाजपा के लिए आगामी विधानसभा चुनाव जीतना कठिन हो जाएगा.

विधायक ज्ञानदेव आहूजा का वीडियो भी बना मुसीबत

राजस्थान में प्रदेश नेतृत्व पर सवाल उठाने का यह मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि उपचुनावों की हार को लेकर पार्टी के ही रामगढ़ विधायक ज्ञानदेव आहूजा का एक कथित ऑडियो वायरल होने की खबर आ गई. इसमें विधायक यह कहते सुने गए कि, ‘ये तो सरकार हारी है, हम थोड़े ही हारे हैं.’ इस वायरल ऑडियो ने भाजपा के प्रदेश संगठन में भूचाल मचा दिया, क्योंकि ज्ञानदेव आहूजा ने कथित ऑडियो में लोकसभा उपचुनाव में पार्टी के प्रत्याशी रहे प्रदेश के मंत्री जसवंत सिंह यादव पर भी सवाल उठाए थे. आहूजा के बयान पर पार्टी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी. सत्तारूढ़ भाजपा के अंदर उपजी ऐसी स्थिति का फायदा सीधे-सीधे कांग्रेस को मिला. कांग्रेस ने इन चुनावों में मिली जीत को आने वाले विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल बताते हुए भाजपा की बेचैनी और बढ़ा दी है.

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गुजरात में बड़ी मुश्किल से संभले थे हालात

भाजपा के लिए गुजरात विधानसभा का चुनाव जीतना सिर्फ चुनावी राजनीति का ही हिस्सा नहीं था, बल्कि यह प्रदेश पार्टी का गढ़ है, इसलिए भी यहां सत्ता बचाना अन्य राज्यों से ज्यादा जरूरी था. लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद से पार्टी का प्रदेश संगठन इतना मजबूत नहीं रह गया था. मोदी के प्रदेश छोड़ने के बाद मुख्यमंत्री पद पर दो बार परिवर्तन हो चुका था. एक बार तो आनंदी पटेल सीएम बनी. इसके बाद जैन समुदाय से आने वाले नेता विजय रूपाणी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया. ऐसे में प्रदेशस्तर पर ऐसा कोई नेता नहीं था जिसके भरोसे पार्टी विधानसभा चुनाव में उतरने का जोखिम मोल लेती. लिहाजा विधानसभा चुनाव भी मोदी के नाम पर ही लड़ा गया और पीएम मोदी की बदौलत ही प्रदेश में भाजपा की सरकार बन पाई. यहां यह गौरतलब है कि गुजरात में कांग्रेस इतनी मजबूत स्थिति में नहीं थी कि भाजपा को टक्कर दे सके, लेकिन राहुल गांधी की चुनाव से पहले की गई मेहनत, पाटीदार आरक्षण आंदोलन से बनी स्थिति और अल्पेश ठाकोर व जिग्नेश मेवाणी जैसे नेताओं के उभार से पार्टी के प्रदेशस्तर के नेता बेचैन होने लगे. मगर यह पीएम मोदी का करिश्मा ही था कि भले ही विधानसभा में पार्टी की सीटें कम हुईं, लेकिन सत्ता अपने ही हाथों में रह गई थी.

चुनावों के बाद भी सत्ता को लेकर घमासान

विधानसभा चुनावों के बाद भी भाजपा संगठन में सब कुछ सही नहीं था. यही वजह थी कि पहले की सरकार में उप-मुख्यमंत्री समेत कई मंत्रालयों का प्रभार रखने वाले नितिन पटेल ने इस बार मनोनुकूल प्रभार न मिलने पर अपनी नाराजगी दिखाई. वे मंत्री पद की शपथ लेने के बाद भी अपने कार्यालय में नहीं गए. नितिन पटेल चूंकि पाटीदार समुदाय से आते हैं, इसलिए उनके विपक्षी पाटीदार नेताओं और कांग्रेस से बातचीत की खबरें प्रदेश की सियासत को गरमाने लगीं. पाटीदार आरक्षण आंदोलन से उपजे नेता हार्दिक पटेल ने तो यहां तक कह दिया कि अगर वे भाजपा से अलग हो जाएं तो कांग्रेस के साथ मिलकर उनके लिए सम्मानित पद खोजा जा सकता है. बहरहाल तीन-चार दिनों की झंझावात के बाद पार्टी का अंदरूनी कलह समाप्त हुआ, नितिन पटेल मान गए और सरकार तथा भाजपा ने चैन की सांसें लीं.