नई दिल्ली. भारतीय जनता पार्टी की केंद्र की सत्ता में दोबारा वापसी सुनिश्चित करने वाले, पार्टी के कई प्रदेश अध्यक्ष अब नई सरकार में मंत्री बन गए हैं. पार्टी ने भी अपने इन दिग्गजों को उनकी मेहनत का समुचित इनाम दिया. लेकिन इसके साथ ही पार्टी के सामने विभिन्न राज्यों में अपने संगठन का मुखिया चुनने की चुनौती सामने आ गई है. खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना और महाराष्ट्र – जहां के प्रदेश अध्यक्ष वर्तमान सरकार में विभिन्न विभागों के मंत्री बनाए गए हैं, उनकी जगह पर नए नेता का चुनाव भाजपा के लिए कम कठिन नहीं है. इन राज्यों में लोकसभा चुनाव के बाद फौरन नेतृत्व परिवर्तन की कवायद शुरू भी हो गई है.

नेतृत्व परिवर्तन की इस कवायद में यूपी से मनोज सिन्हा, बिहार में राधामोहन सिंह और राजस्थान में राज्यवर्द्धन सिंह राठौर का नाम सबसे आगे है. इनके अलावा महाराष्ट्र और तेलंगाना के भाजपा प्रदेश अध्यक्षों के चुनाव की भी कवायद शुरू हो गई है. भाजपा संगठन में चूंकि ‘एक व्यक्ति-एक पद’ का सिद्धांत लागू है, इस लिहाज से भी पार्टी के लिए जरूरी है कि जल्द से जल्द इन राज्यों के नए मुखिया का चुनाव कर लिया जाए. अलबत्ता, जाति-फैक्टर से परे रहकर चुनाव लड़ने और जीतने का दावा करने वाली पार्टी में प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में इस फैक्टर के अहम रहने की संभावना है. इधर, विभिन्न राज्यों में पार्टी के जो विधायक या मंत्री लोकसभा चुनाव में जीतकर संसद पहुंचे हैं, उनके क्षेत्रों में उपचुनाव के लिए नए नेता का चयन भी एक मसला है. इस पर भी भाजपा संगठन में सोच-विचार शुरू हो गया है.

बिहार NDA में सब कुछ ठीक है, नीतीश कुमार हमारे नेता: पासवान

यूपी में मनोज सिन्हा का नाम सबसे आगे
राजनीतिक नजरिए से अहम उत्तर प्रदेश में लगातार दूसरी बार भाजपा ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है. इसके मद्देनजर ही यूपी भाजपा अध्यक्ष महेंद्रनाथ पांडेय को केंद्र में लाया गया है. अब उनकी जगह नए नेता का चुनाव होना है. पांडेय इससे पहले की सरकार में राज्यमंत्री थे, लेकिन यूपी इकाई का प्रभार मिलने के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा था. अंग्रेजी अखबार इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनने की दौड़ में सबसे आगे जिस नेता का नाम है, वह हैं पूर्व केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा.

कभी यूपी के सीएम पद के दावेदार रहे मनोज सिन्हा हाल ही संपन्न हुए लोकसभा के चुनाव में गाजीपुर सीट से हार गए हैं, लेकिन इससे पार्टी के भीतर या प्रदेश भाजपा में उनकी छवि को बहुत ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा है. यही वजह है कि प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में उनका नाम सबसे आगे है. मनोज सिन्हा के अध्यक्ष बनने में सिर्फ एक बाधा उनकी जाति को लेकर आ रही है. यूपी में भूमिहार जाति के मतदाताओं की संख्या सिर्फ 2.5 प्रतिशत है. पार्टी में उनसे पहले इसी जाति के सूर्यप्रताप शाही प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं. ऐसे में इसी जाति के मनोज सिन्हा को प्रदेश अध्यक्ष के पद पर बैठाने से पार्टी को कितना लाभ मिलेगा, इस बिंदु पर भी विचार-विमर्श जारी है. हालांकि मनोज सिन्हा को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और पीएम नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है. इसलिए बहुत संभव है कि उन्हें यूपी भाजपा की कमान सौंपने के साथ-साथ पार्टी की ओर से राज्यसभा में भी लाया जाएगा.

चुनाव बाद एक्शन में योगी, कहा- जेल भेजे जाएंगे युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले लोग

बिहार में राधामोहन सिंह के नाम की चर्चा
यूपी के बाद भाजपा के लिए दूसरा सबसे महत्वपूर्ण राज्य बिहार है, जहां के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय केंद्र में मंत्री बने हैं. उनकी जगह पर नए अध्यक्ष के चुनाव में भी जाति-फैक्टर को अहम माना जा रहा है. इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में नए भाजपा अध्यक्ष के चुनाव के जरिए पार्टी एक बार फिर अपने परंपरागत सवर्ण वोटरों को साधना चाह रही है. इसलिए यादव जाति से आने वाले नित्यानंद राय की जगह, राजपूत जाति के नेता- राधामोहन सिंह का नाम आगे चल रहा है. नित्यानंद राय से पहले ब्राह्मण समुदाय के नेता मंगल पांडेय बिहार भाजपा के अध्यक्ष थे. सियासी नजरिए से उनके बाद राय को लाया गया. अब एक बार फिर भाजपा बिहार में सवर्ण की ओर लौटना चाह रही है. यही वजह है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह, जिन्हें इस बार केंद्र सरकार में जगह नहीं मिली है, को प्रदेश इकाई की कमान सौंपने पर विचार किया जा रहा है.

राजस्थान में राठौर हो सकते हैं प्रदेश के मुखिया
भाजपा के लिए राजस्थान इकाई का मुखिया का चुनाव सबसे अहम माना जा रहा है. वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए, अमित शाह अपने पसंदीदा नेता को राजस्थान इकाई की कमान नहीं दिलवा पाए थे. शाह ने उस समय गजेंद्र सिंह शेखावत का नाम पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित किया था, लेकिन वसुंधरा राजे ने राजपूत जाति से आने वाले शेखावत को इस पद पर नहीं आने दिया. अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, राजे अपने रहते किसी दूसरे राजपूत को राजस्थान में बड़ा नेता बनते नहीं देखना चाहती थी. यही वजह रही कि लाख चाहकर भी गजेंद्र सिंह शेखावत अध्यक्ष नहीं बन सके. लेकिन विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार ने जहां वसुंधरा राजे को ‘कुंद’ कर दिया, वहीं गजेंद्र सिंह शेखावत चुनाव जीतकर केंद्र में मंत्री भी बन गए हैं. ऐसे में भाजपा एक बार फिर राजपूत समुदाय के किसी नेता को ही इस पद पर लाना चाहती है. इस क्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री राज्यवर्द्धन सिंह राठौर का नाम सबसे आगे चल रहा है. चूंकि केंद्र में मंत्री पद मिलने से शेखावत स्वतः ही इस पद के योग्य नहीं रह गए हैं, ऐसे में राठौर को प्रदेश भाजपा के प्रमुख पद पर बैठाना पार्टी के लिए मुश्किल नहीं रह गया है.

टीम पीएम मोदी 2.0: राज्यसभा में कम हुई बीजेपी की ताकत, सदस्यों की संख्या घटी, जानिए क्या है वजह

टीम पीएम मोदी 2.0: राज्यसभा में कम हुई बीजेपी की ताकत, सदस्यों की संख्या घटी, जानिए क्या है वजह

तेलंगाना और महाराष्ट्र में भी आएंगे नए नेता
यूपी, बिहार और राजस्थान की तरह भाजपा की तेलंगाना और महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्षों को भी बदला जाना है. खासकर तेलंगाना, जहां पार्टी ने पहली बार शानदार प्रदर्शन किया है, के प्रदेश अध्यक्ष जी. किशन रेड्डी को इसके मद्देनजर केंद्र में मंत्री भी बनाया गया है. ऐसे में रेड्डी की जगह तेलंगाना इकाई में भी जल्द ही नए अध्यक्ष का चुनाव होना है. इसके अलावा महाराष्ट्र में भी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के पद पर बदलाव की खबरें हैं. भाजपा की महाराष्ट्र इकाई के प्रमुख राव साहब दान्वे प्रदेश सरकार में मंत्री हैं, ऐसे में ‘एक व्यक्ति-एक पद’ सिद्धांत के मद्देनजर उन्हें हटाने की चर्चा है. लेकिन अगले कुछ महीनों में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उन्हें इस पद पर बनाए रखा जाएगा या उनकी जगह अमित शाह किसी नए व्यक्ति को लाएंगे, इसको लेकर कयास जारी है.