नई दिल्ली. पांच राज्यों में चुनाव के बाद अब साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर बात शुरू हो गई है. चुनाव से पहले जहां बीजेपी आम चुनाव में भी मजबूत नजर आ रही थी, हिंदी हर्टलैंड (मध्यप्रदेश, छ्त्तीसगढ़ और राजस्थान) में हार के बाद उसके सामने चुनौती साफ तौर पर दिख रही है. एनडीए के दूसरे घटकों लोजपा और शिवसेना ने भी दबाव बनाना शुरू कर दिया है. ऐसे में जानना ये जरूरी है कि उत्तर भारत में चुनौतियों का सामना कर रही बीजेपी के लिए दक्षिण भारत की क्या स्थिति है…

दक्षिण में बीजेपी अभी तक अपना पैर नहीं जमा पाई है. हालांकि, साल 2014 के चुनाव में पार्टी को मोदी लहर का जरूर फायदा मिला, लेकिन अभी भी वहां संगठन के रूप में बीजेपी उतनी मजबूत स्थिति में नहीं है. कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में बीजेपी अभी तक अकेले लड़ने की सोच रही है. लेकिन, अकेले उसकी स्थिति सीट निकालने की नहीं बनती दिख रही है.

तेलंगाना
दक्षिण के चार तटीय राज्यों की बात करें तो तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में बीजेपी आंकड़ों में ही फेल नजर आ रही है. तेलंगाना में हाल ही में विधानसभा चुनाव हुए हैं. वहां जिस तरह से चंद्रशेखर राव की टीआरएस ने एकतरफा जीत दर्ज की है और हैदराबाद रीजन में भी बीजेपी के वोट शेयर गिरे हैं, उससे उसके लिए चिंता की बात जरूर है. चंद्रशेखर राव लगातार गैर बीजेपी-गैर कांग्रेसी सरकार की वकालत कर रहे हैं और हाल ही में उन्होंने इसके लिए कई क्षेत्रीय दलों के नेताओं से मुलाकात भी की है. ऐसे में प्रदेश की 17 लोकसभा सीटों पर बीजेपी नाजुक स्थिति में है.

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आंध्रप्रदेश
आंध्रप्रदेश में लोकसभा की 25 सीटें हैं. लेकिन यहां पार्टी के लिए खतरा ये है कि तेलंगाना में जिस तरह कांग्रेस चंद्रबाबू नायडू के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी, वैसा ही समीकरण 2019 में भी बना तो बीजेपी के लिए मुश्किलें और खड़ी हो सकती हैं. प्रदेश में पहले से कमजोर पड़ी बीजेपी यहां क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करके कितनी सीटें जीतेंगी ये नहीं कहा जा सकता है.

कर्नाटक
कर्नाटक की बात करें तो साल 2014 में यहां मोदी लहर साफ तौर पर दिखा था. बीजेपी 28 में से 19 सीट जीतने में कामयाब रही थी. लेकिन, इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद बीजेपी सरकार नहीं बना पाई. दूसरी तरफ कांग्रेस और जेडीएस एक साथ आ गए हैं. इन दोनों ने मिलकर पिछले चुनाव में 11 सीटें जीती थीं. ऐसे में इस बार बीजेपी को कर्नाटक से भी बड़ी उम्मीद लगती नहीं दिख रही है.

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केरल
केरल में बीजेपी लगातार कमजोर रही है. लेकिन अमित शाह ने प्रदेश में लगातार दौरा करके एक माहौल बनाने की कोशिश की है. सबरीमाला मुद्दे पर भी बीजेपी ने एक स्टैंड ले रखा है. इन सबका संसदीय चुनाव में कितना असर पड़ता है और 20 में से कितनी सीटें मिलती हैं ये तो परिणाम ही बताएंगे. लेकिन मौजूदा स्थित बीजेपी को बहुत उत्साहित करने वाली नहीं है. यहां आज तक बीजेपी ने खाता नहीं खोला है.

तमिलनाडु
तमिलनाडु में लोकसभा की 39 और पड़ोसी केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी में एक लोकसभा सीट है. लेकिन इन सभी 40 सीटों पर भाजपा की स्थिति खराब है. 2014 के चुनाव में जयललिता के जीवित रहने के वक्त एआईएडीएमके ने तमिलनाडु की 39 में से 37 सीटें जीती थीं.  कन्याकुमारी सीट से भाजपा के पोन राधाकृष्णन चुनाव जीते थे. जयललिता के निधन के बाद राज्य का सियासी गणित बिगड़ गया है. एआईएडीएम के भीतर आपसी सिरफुटौव्वल है वहीं डीएमके मजबूत होकर उभरी है. डीएमके ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है. प्री पोल सर्वे में भी कहा जा रहा है कि डीएमके तमिलनाडु में बड़ी ताकत बनकर उभरेगी. इससे कांग्रेस को फायदा होगा. पुड्डुचेरी में भी भाजपा नहीं है.