नई दिल्ली: संसद का शीतकालीन सत्र सोमवार से आरंभ हो रहा है और इस सत्र में नागरिकता (संशोधन) विधयेक 2019 पर चर्चा उसी प्रकार सरकार के मुख्य एजेंडा में शामिल है, जिस प्रकार मानसून सत्र के दौरान जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 को प्रमुखता दी थी. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व में केंद्र सरकार इस सत्र के दौरान नागरिकता (संशोधन) विधयेक को पास करवाना चाहेगी. संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार ने जिन विधेयकों को पास करने को लेकर मंजूरी प्रदान की है उनकी सूची में नागरिकता (संशोधन) विधयेक 2019 को 16वें नंबर पर रखा गया है.

देशभर में राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) को लेकर आगे कोई भी अभियान चलाने के लिए भाजपा सरकार के लिए इस विधेयक को पास करवाना आवश्यक है. इससे पहले लोकसभा चुनाव के दौरान इस पर पूर्वोत्तर के राज्यों से कड़ा विरोध होने के मद्देनजर विधेयक को पास करवाने पर जोर नहीं दिया गया और पिछली लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होने के साथ विधेयक खारिज हो गया.

पिछली बार से ज्यादा बड़ा जनादेश (303 सीटों) के साथ भाजपा अब दोबारा सत्ता में आई है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत लगातार भाजपा पर देशव्यापी एनआरसी लाने पर दबाव बनाए हुए हैं, इसलिए सरकार इस बार नागरिकता (संशोधन) विधेयक को संसद में पास करवाना करवाना चाहेगी.

इस विधेयक से मुस्लिम आबादी बहुल पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आने वाले गैर-मुस्लिम अप्रवासियों के लिए भारत की नागरिकता लेना आसान हो जाएगा. हालांकि विधेयक में इसे स्पष्ट नहीं किया गया है लेकिन इसके तहत ऐसा प्रावधान किया गया है कि इन देशों में अत्याचार सह रहे हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं और इसमें मुस्लिम को शामिल नहीं किया गया है.

इस विधेयक में नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन किया गया. नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार, भारत की नागरिकता के लिए आवेदक का पिछले 14 साल में 11 साल तक भारत में निवास करना आवश्यक है. लेकिन संशोधन में इन तीन देशों से आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, और ईसाई समुदाय के लोगों के लिए इस 11 साल की अवधि को घटाकर छह साल कर दिया गया है.

एनआरसी असम में एक लंबित मांग रही है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर असम में अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें पंजी से हटाया गया है, लेकिन इसके लागू होने के बाद इसे देशभर में लागू करने की मांग तेज हो गई है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी चुनावी रैलियों के दौरान इस मसले को उठाया.

बीते महीने अक्टूबर में अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में इस मसले को उठाया. उन्होंने कहा, “हमने राज्यसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक लाया, लेकिन टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस पार्टी) ने उच्च सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी. उन्होंने इस विधेयक को पारित नहीं होने दिया. हमारे देश में ऐसे लोग हैं जिन्हें अब तक भारत की नागरिकता नहीं मिली है.” हरियाणा में मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने भी अपने चुनावी अभियान के दौरान प्रदेश में एनआरसी लाने का वादा किया. उधर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत इसको लेकर दबाव बनाए हुए हैं.

(इनपुट भाषा)