नई दिल्ली. नाटक करना या होते देखना, अपने आप में आनंद की एक अनुभूति है. पर्दा उठने के साथ ही मंच पर जहां कलाकार सक्रिय हो उठते हैं वहीं सामने बैठा दर्शक भी उससे खुद को जोड़ने की कोशिश शुरू कर देता है. यह प्रक्रिया पूरे माहौल को रंग-मय बना देती है. वातावरण जीवंत हो उठता है. विश्व रंगमंच दिवस पर नाटक करने और उससे जुड़े रहने के इसी आनंद के बारे में बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार और रंगकर्म से जुड़े पशुपति शर्मा. आइए पढ़ें. Also Read - 'इंडिया' शब्‍द हटाकर 'भारत' या 'हिंदुस्तान' करने की पिटीशन पर SC में 2 जून को सुनवाई

वर्ल्ड थियेटर डे. रंगमंच के उत्सव का एक दिन. वो उत्सवधर्मिता जो रंगकर्म में स्वत: अंतर्निहित है. यकीन न हो तो किसी रंगकर्मी से पूछ कर देख लें. नाटक के खयाल के साथ ही कैसे उसका तन-मन खिल उठता है. नाटक की रीडिंग शुरू होते ही उसकी रचनात्मक ऊर्जा का प्रस्फुटन शुरू हो जाता है. वो नाटक की कथा-वस्तु और अपने कैरेक्टर को लेकर तरह-तरह की कल्पनाएं करने लगता है. ज्यों-ज्यों ये कल्पना साकार होती है, उसकी खुशी बढ़ती जाती है. एक निरंतर प्रक्रिया, जो आनंद से सराबोर रहती है. Also Read - भारत में जून-जुलाई में तबाही मचा सकता है कोरोना वायरस, अपने चरम पर होगा संक्रमण

और प्रस्तुति के दिन का तो कहना ही क्या? मानों रात की नींद गायब हो जाती है, दिन का चैन कहीं खो सा जाता है. बस बेसब्री रहती है उस पल की, जब थियेटर हॉल में वो आखिरी बेल बजती है. दर्शकों के सामने हफ्तों और महीनों की साधना का प्रदर्शन, मानो कलाकार के लिए उत्सव का चरम बिंदु बन जाता है. हॉल में बजने वाली तालियां और मुबारकबाद के चंद शब्दों से मन गद्गद हो उठता है. वाकई, किसी रंगकर्मी के लिए होली और दीवाली से बड़ा उत्सव उसके नाटक के प्रदर्शन का दिन हुआ करता है. Also Read - BRICS समूह के विदेश मंत्रियों की मीटिंग, जयशंकर बोले- कोरोना से जंग में 85 देशों की मदद कर रहा है भारत

उत्सवधर्मिता में एक और बात है, उसकी सामूहिकता. रंगकर्म भी इसी सामूहिकता का उत्सव है. वो अकेले में किया जाने वाला कोई कर्म नहीं है. नाट्य आलेख, निर्देशन, अभिनय, मंच सज्जा, प्रकाश, मेकअप, पब्लिसिटी न जाने कितने आयाम एक प्रस्तुति से जुड़ जाते हैं. एक अकेला व्यक्ति चाह कर भी इसे अंजाम नहीं दे सकता. और सबसे बड़ी बात उसे अपनी इस कला के प्रदर्शन के लिए एक दर्शक समाज चाहिए होता है. खुद में सिमटते व्यक्ति को समाज से जोड़ने का काम करता है, रंगकर्म. ये और बात है कि रंगकर्मियों का समूह कभी इसका ढिंढोरा नहीं पीटता. वो तो इतने भर से खुश हो लेता है कि चलो लोगों ने रंगकर्म के लिए वक़्त तो निकाला.

अगर आप कभी भूले से भी किसी नाटक का हिस्सा बन जाएं तो उसकी यादें जेहन में ता-उम्र बनी रहती है. बस जिक्र भर छेड़ने की देर है. आप कह उठते हैं- हमने क्लास फोर या फाइव में एक नाटक किया था. कोई कहता है-अरे कॉलेज के दिनों में जबरन मुझे राजा का दरबान बना दिया था. कोई कहता है- मैं तो बीच नाटक की रिहर्सल से ही डर के मारे भाग आया. और कोई प्रदर्शन के दौरान हुई गलतियों को याद कर मुस्कुरा उठता है. नाटकों की दुनिया वाकई एक अप्रत्याशित किस्म के रोमांच से भरी होती है. एक जिंदा कला है रंगकर्म और उतने ही जिंदादिल होते हैं-रंगकर्मी. हर शख्स अपने इस रंगकर्मी दिल को धड़कन को महसूस करना चाहता है. ये और बात है कि उसे जिंदगी की भागमभाग में वक़्त न मिल पाता हो लेकिन इस उत्सव का साझीदार बनने की तड़प उसे थियेटर हॉल तक जरूर खींच लाती है. रंगकर्मी की हैसियत से न सही, दर्शक बन कर ही वो अपनी अधूरी तमन्नाओं की कशिश जिंदा रखता है.

और कभी टटोलिए अपने मन को, हमारे-आप के सबके दिलों में एक नटकिया जरूर बसता है. वो नटकिया कभी आईने के सामने चुहलबाजी कर मुस्कुरा उठता है तो कभी यार-दोस्तों के बीच एक दूसरे की नकल उतार ठहाका लगाता है. वो नटकिया कभी मां के सामने उसे रिझाने के लिए ‘कान्हा’ बन जाता है तो कभी मास्टरसाब की डांट-फटकार से बचने के लिए चेहरे पर दुनिया की उदासी ओढ़ लेता है. वो नटकिया पत्नी के साथ बागों में पहुंचकर रोमांटिक हीरो बन जाता है तो वही नटकिया ऑफिस में गंभीर दिखने की भरसक कोशिश जरूर करता है. मैंने तो बस आपके नटकिया दिल के तार छेड़े हैं, इसमें खुद आपको कितने रूप नज़र आ रहे होंगे, ये तो आपको ही बताना होगा.

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)