नई दिल्ली: जब आज़ादी के बारे में सोचने, समझने और पढ़ने की कोशिश करते हैं. कुछ कहानियां, कुछ तस्वीरें और कुछ क्रांतिवीरों का ज़िक्र होता है, उनके नाम, तस्वीरें और कारनामे ज़ेहन में आते हैं, लेकिन आज़ादी शब्द को देश की रग-रग में महसूस कराने वाले दीवाने इतने भर नहीं थे. देश के लगभग हर हिस्से में आज़ादी के नायक थे और उनके किस्से आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाए जाते हैं, इसके बाद ये किस्से कहीं दर्ज नहीं किये गए. ऐसे ही एतिहासिक किस्सों को दर्ज करने का काम किया शाह आलम (Shah Alam) ने. शाह आलम ऐसे शख्स हैं, जो इस देश को उसके हर नायक के बारे में बता देना चाहते हैं और एतिहासिक दस्तावेजों और दुर्लभ किस्सों से सजी ‘आज़ादी की डगर पे पाँव’ (Azadi Ki Dagar Pe Paanv) किताब शाह आलम की इसी कोशिश का हिस्सा है. चम्बल फाउंडेशन से प्रकाशित ये किताब चर्चा का विषय बनी हुई है. इस किताब का विमोचन आज उरई में किया जाएगा. Also Read - किताब: सिहरन पैदा करने वाली दुनिया में ले जाती है 'बीहड़ में साइकिल', चम्बल का हर पहलू है दर्ज

‘द स्टोरी ऑफ़ माउजर’: एक क्रांतिवीरों का किस्सा
शाह आलम की इस तरह की कोशिशें अब तक बेहद कामयाब रही हैं. उन्होंने इस बार देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे-ऐसे किस्से जुटाए हैं, जो हैरत में डालने के साथ ही देश के बारे में सोचने को मजबूर करते हैं. ‘आज़ादी की डगर पे पाँव’ ऐसे महानायकों और उनके योगदान को समर्पित होकर याद दिलाती है, जिन्होंने बेहद ख़ामोशी से ख़ुद को देश के लिए उड़ेल दिया. देश के लिए अपनी ज़िन्दगी के तीस साल अंडमान की जेल में नारकीय जीवन काटने वाले त्रैलोक्य महाराज, शचीन्द्रनाथ बख्शी, चन्द्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल, मुरारी लाल, बनवारी लाल, मन्मथ गुप्त जैसे क्रांतिवीरों का किस्सा ‘द स्टोरी ऑफ़ माउजर’ आपको क्रांति के दिनों में ले जाएगा. अंग्रेजों से लड़ने के लिए माउजर्स खरीदने को रुपए नहीं थे. फिर कैसे इन क्रांतिकारियों ने ट्रेन लूटी और 4553 रुपए 3 आना 6 पाई लूट लिए. और कैसे समुद्र के तीन मील अन्दर जाकर इंटरनेशनल वाटर्स में जहाज से माउजर्स की डिलीवरी ली थी. बंगाल की खाड़ी से माउजर्स लेकर समुद्री रास्ते से कई किलोमीटर तैरते हुए वापस लौटे. ट्रेन से लूटे गए इन कुछ हज़ार रुपयों से 50 माउजर और पचास हज़ार कारतूस मिले थे. ये माउजर्स जर्मनी के थे. इलाहाबाद में चन्द्रशेखर आज़ाद यही माउजर चलाते हुए अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए थे. भगत सिंह ने लाहौर में ब्रिटिश अँगरेज़ ऑफिसर जान सांडर्स को इसी पिस्तौल से मारा था. ‘स्टोरी ऑफ़ माउजर’ बेहद दिलचस्प है, जिसे पढ़कर कोई भी डूब जाएगा. Also Read - बागियों की धरती रहा जो चंबल, अब वहां हो रहा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल, कुछ ऐसा रहा है इतिहास

इसके साथ ही शहीद रोशन सिंह की कुर्बानी का मोल, आज़ादी आन्दोलन का बनारस कनेक्शन, आज भी सरकारी कैद में हैं अशफाक, सत्तर साल बाद भी अँधेरे से लड़ता एक शहीद, फांसी से पहले अशफाक की तहरीर, सरफरोशी की तमन्ना का बिस्मिल कौन है, आज़ादी की लड़ाई का वह महाविद्रोही, महुआ डाबर एक्शन के महानायक पिरई खां, शहीद रामचंद्र विद्यार्थी के बहादुरी के किस्से बेहद दुर्लभ दस्तावेजों के साथ रोचक तरीके से लिखे गए हैं. Also Read - फूलन देवी की माँ द्वारा जारी 'चंबल मेनिफेस्टो' राजनीतिक दलों को सौंपा गया, समस्याओं पर चर्चा

ये किताब क्रांतिकारियों का इतिहास ही नहीं, वर्तमान भी बताती हैं कि कैसे क्रांतिकारियों को भुला दिया गया. कई स्वतंत्रता सेनानियों ने किताब में अपने गुजरे वक़्त के हालात, वर्तमान और भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त की है. किताब क्रांतिकारियों की कई शिकायतें लेकर पाठक तक कामयाबी के साथ पहुँचती है.

कौन हैं शाह आलम
शाह आलम इटावा में चंबल संग्राहलय (Chambal Museum) को बनाने में अहम भूमिका निभा चुके हैं. शाह आलम ने अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद और जामिया सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली से पढ़ाई की. डेढ़ दशक से घुमंतू पत्रकारिता का चर्चित नाम हैं. भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के जानकार हैं. 2006 में ‘अवाम का सिनेमा’ की नींव रखी. देश में 17 केन्द्र हैं, जहां कला के विभिन्न माध्यमों को समेटे एक दिन से लेकर हफ्ते भर तक आयोजन अक्सर चलते रहते हैं. ‘अवाम का सिनेमा’ के जरिये वे नई पीढ़ी को क्रांतिकारियों की विरासत के बारे में बताते हैं. शाह आलम का नाम चम्बल में 2800 किमी से अधिक दूरी साइकिल से तय करके बीहड़, डकैतों और मातृवेदी क्रांतिकारियों के गहन शोध के लिए जाना जाता है. साइकिल से चम्बल की यात्रा काफी चर्चित रही थी. इस यात्रा के आधार पर वह बीहड़ में साइकिल’, जैसी किताब लिख चुके हैं. दर्जनों दस्तावेजी फिल्मों का निर्माण करने वाले शाह की इसी साल ‘मातृवेदी-बागियों की अमरगाथा’ पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है. आज़ादी की डगर पे पाँव उनकी चौथी किताब है.