
Anjali Karmakar
अंजलि कर्मकार 12 साल से जर्नलिज्म की फील्ड में एक्टिव हैं. उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया है. यहीं से मास कॉम में मास्टर्स की डिग्री ली ... और पढ़ें
मेडिकल साइंस में अक्सर ऐसे केस आते हैं, जो दुनिया को हैरानी में डाल देते हैं. बड़े से बड़े डॉक्टर भी समझ नहीं पाते कि ऐसा क्यों हुआ? असम में एक ऐसा ही केस आया है. यहां एक 11 महीने की बच्ची के पेट में इंसानी दिमाग डेवलप हो रहा था. इस दिमाग का वजन करीब आधा किलोग्राम का है. डॉक्टरों ने 19 घंटे लगातार चले ऑपरेशन के बाद बच्ची के पेट से 550 ग्राम के ब्रेन टिश्यू को बाहर निकाला है. ये वजन में एक ब्रेड के पैकेट जितना भारी था. डॉक्टरों के मुताबिक, ये मामला इतना रेयर है कि अब तक दुनिया में सिर्फ 6 ऐसे मामले आए हैं. फिलहाल बच्ची खतरे से बाहर है और रिकवर कर रही है.
7 महीने की उम्र में हुई ये बीमारी
‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ की रिपोर्ट के मुताबिक, मामला असम के गुवाहाटी का है. बच्ची जब 7 महीने की थी, तब से उसे ये बीमारी हुई. बच्ची का पेट धीरे-धीरे फूलता जा रहा था. शुरू में तो मां-बाप इसे गैस या गांठ समझ रहे थे. बच्ची को गैस की दवा दी जा रही थी. लेकिन, धीरे-धीरे बच्ची के पेट की सूजन बढ़ती गई. एक समय ऐसा भी आया कि बढ़े हुए पेट की वजह से मासूम को सांस तक लेने में दिक्कत होने लगी थी. बच्ची का पेट फूलता जा रहा था, लेकिन उसका वजन तेजी से घट रहा था. 11 महीने की बच्ची का वजन एक समय पर 8 किलो रह गया था.
सीटी स्कैन की रिपोर्ट देख उड़ गए डॉक्टरों के होश
परेशान मां-बाप अपनी बच्ची को शहर के बड़े अस्पताल लेकर गए. वहां कई मेडिकल टेस्ट हुए. बच्ची का यूरिन, ब्लड टेस्ट और चेस्ट का एक्सरे नॉर्मल पाया गया. फिर डॉक्टरों ने कंट्रास्ट सीटी स्कैन (CT Scan) कराने का फैसला लिया. स्कैन की रिपोर्ट देख डॉक्टरों के होश उड़ गए. बच्ची के पेट के निचले हिस्से में एक बड़ी गांठ थी. ये गांठ असल में ब्रेन टिश्यू के जमा होने से बन रही थी. इस गांठ ने किडनी और पेन्क्रियाज को शिफ्ट कर दिया था.

बच्ची के पेट का सीटी स्कैन और सर्जरी के बाद निकाला गया ब्रेन टिश्यू.
‘न्यूरोग्लियल हेटेरोटोपिया’ नाम की रेयर बीमारी का चला पता
अब डॉक्टरों ने इस गांठ की जांच की. रिपोर्ट में पाया गया कि ये कोई नॉर्मल ट्यूमर नहीं था. ये ‘न्यूरोग्लियल हेटेरोटोपिया’ (Neuroglial heterotopia) नाम की एक रेयर बीमारी है. इस बीमारी में शरीर में दिमाग के ऊतक यानी ब्रेन टिश्यू सिर के बाहर किसी दूसरे ऑर्गन में डेवलप होने लगते हैं. पूरी दुनिया में अब तक इस बीमारी के सिर्फ 6 केस ही सामने आए हैं.
क्यों होती है ये बीमारी?
ये न्यूरॉन्स के ब्रेन डेवलपमेंट के दौरान गलत दिशा में जाने (माइग्रेट करने) के कारण होता है. इससे वे सामान्य कॉर्टिकल लेयर में न पहुंचकर गलत जगह पर रुक जाते हैं. इस बीमारी में पेरिवेंट्रीकुलर हेटेरोटोपिया (PVH) सबसे आम प्रकार है. इसमें न्यूरॉन्स ब्रेन के वेंट्रिकल्स (तरल-भरे स्थान) के पास जमा हो जाते हैं. जबकि, नासोफेरींजियल ग्लियल हेटेरोटोपिया (NGH) नाक या गले के पीछे पाया जाने वाला एक दुर्लभ प्रकार है, जो जन्मजात गांठ के रूप में दिखता है.
19 घंटे में पूरी हुई सर्जरी
बीमारी डायग्नोस होने के बाद अब सर्जरी की बारी थी. ट्यूमर शरीर की मुख्य रक्त धमनियों और गुर्दे के बेहद करीब था. इसलिए सर्जरी बहुत रिस्की थी. नन्ही सी जान को खतरा था. लेकिन, डॉक्टरों की टीम ने बड़ी बहादूरी और सुझबूझ से इस सर्जरी को 19 घंटे में पूरा किया. ऑपरेशन के 4 दिनों के अंदर बच्ची को घर भी जाने दिया गया.
अभी कैसी है बच्ची?
ऑपरेशन के बाद बच्ची धीरे-धीरे रिकवर कर रही है. दूध पी पा रही है. उसका वजन भी बढ़ने लगा है.
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