नई दिल्ली. कर्नाटक चुनाव में पांच दिन चले उठापटक के बाद सीएम येदियुरप्पा ने शनिवार को फ्लोर टेस्ट से पहले इस्तीफा दे दिया. वह इस बार 55 घंटे के सीएम रहे. बता दें कि इससे पहले भी येदियुरप्पा ने दो बार सीएम पद की शपथ ली थी, लेकिन एक बार भी वह अपना कार्यकाल नहीं पूरा कर पाए हैं. पहली बार 7 दिन तो दूसरी बार तीन साल दो महीने में ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. लिंगायत समुदाय से आने वाले येदियुरप्पा एक ऐसे चेहरे के रूप में हैं, जिसके बल पर दक्षिण में बीजेपी मजबूती बनाने में कामयाब रही है. Also Read - केन्द्र के नियमन में डिजिटल प्लेटफॉर्म के खिलाफ कार्रवाई करने के कोई प्रावधान नहीं: सुप्रीम कोर्ट

27 फरवरी 1943 को सामान्य लिंगायत परिवार में जन्मे येदियुरप्पा शुरुआती दौर से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहे. साल 1972 में उन्हें शिकारीपुरा तालुका जनसंघ का अध्यक्ष चुना गया. इमरजेंसी के दौरान वह जेल गए और वहीं से उन्होंने राजनीति में संघर्ष सीखा. Also Read - Tandav Case: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "कई बार अश्लील कंटेंट दिखाते हैं कुछ OTT प्लेटफॉर्म, स्क्रीनिंग जैसा कोई नियम बनाए केंद्र"

पहली बार 7 दिन के लिए बने थे सीएम
साल 1988 में वह वह पहली बार कर्नाटक बीजेपी के अध्यक्ष बने. साल 1983 में वह शिकारीपुर से विधानसभा पहुंचे. बता दें कि अभी तक वह 6 बार इसी सीट से चुनाव जीत चुके हैं. साल 1994 और 2004 में वह विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने. साल 2006-7 में वह जेडीएस के साथ बीजेपी के हुए एक समझौते में डिप्टी सीएम बने. इस समझौते के मुताबिक, जेडीएस और बीजेपी का 20-20 महीने सीएम बनना था. लेकिन बीजेपी का टर्म आने पर कुमारस्वामी ने समर्थन वापस ले लिया. येदियुरप्पा 12 नवंबर 2007 को पहली बार सीएम बने थे. लेकिन 19 नवंबर को ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. Also Read - परिवार के 7 सदस्‍यों की हत्‍या की दोषी शबनम को रामपुर से बरेली जेल भेजा, जानिए क्‍यों?

घोटाले में गई दूसरी सरकार
साल 2008 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिला और येदियुरप्पा एक बार फिर राज्य के सीएम बने. उनका ये मुख्यमंत्रीत्व काल काफी विवादित रहा और तीन साल बाद खनन घोटाले में फंसने पर उनकी कुर्सी चली गई.

लिंगायत फैक्टर का असर
सीएम की कुर्सी जाने के बाद येदियुरप्पा बीजेपी से अलग हो गए. ऐसे में लगा कि वह पूरे लिंगायत फैक्टर के साथ अपने बल पर राजनीति करेंगे. लेकिन, बीजेपी को यह समझते देर नहीं लगी कि येदियुरप्पा के बिना राज्य में उसका कोई जनाधार नही रह जाएगा. ऐसे में 2018 में भी बीजेपी ने उन्हें अपना सीएम पद का उम्मीदवार बनाया है.