कॉन्वेंट स्कूल की छात्राओं के गायब होने का मामला: प्रधानाध्यापिका, वार्डन ने हाईकोर्ट में दाखिल किया हलफनामा, कहा- नहीं करेंगे दुर्व्यवहार

बेंगलुरु के 126 साल पुराने एक स्कूल की प्रधानाध्यापिका, वार्डन और अध्यापक ने कर्नाटक हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा है कि बच्चों के साथ दुर्व्यवहार नहीं किया जाएगा

Published date india.com Published: October 31, 2022 4:46 PM IST
Case of disappearance of girl students of convent school Bengaluru: Principal, warden filed affidavit in Karnataka High Court, saying - will not misbehave
फोटो प्रतीकात्मक

बेंगलुरु: बेंगलुरु के 126 साल पुराने एक स्कूल की प्रधानाध्यापिका, वार्डन और अध्यापक ने कर्नाटक हाईकोर्ट में व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर कहा है कि बच्चों के साथ दुर्व्यवहार नहीं किया जाएगा. उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्देश दिया था कि उनके (स्कूल के बच्चों के) साथ अपने बच्चों जैसा व्यवहार करें. बेंगलुरु स्थित गर्ल्स कॉन्वेंट स्कूल की कुछ छात्राएं अध्यापकों के साथ गलतफहमी होने के बाद लापता हो गई थी.

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के बाद उन्हें चेन्नई में ढूंढ निकाला गया और हाईकोर्ट में पेश किया गया. उच्च न्यायालय ने यह पाया कि न सिर्फ छात्राओं के परिवार में, बल्कि शिक्षण संस्थान में और समाज में भी समस्याएं व्याप्त हैं. साथ ही, प्रधानाध्यापिका, वार्डन और अध्यापक को अपना-अपना व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया.

प्रधानाध्यापिका ने अपने हलफनामे में कहा, मैंने कहा है कि बच्चों के दूर जाने का चाहे जो कुछ भी कारण रहा हो, मैं बहुत तनाव में थी. उनका पता चलने के बाद मुझे खुशी मिली और इस बात का ध्यान रखूंगी कि भविष्य में इन बच्चों के साथ किसी अध्यापक या गैर-शिक्षण कर्मचारी की ओर से जरा भी खराब व्यवहार नहीं हो.

हलफनामे में यह भी कहा गया है, अवांछित स्थितियों से निपटने के लिए शिक्षण और गैर शिक्षण कर्मचारियों की जानकारी अद्यतन करने को लेकर मैं मनोवैज्ञानिकों, पेशेवर परामर्शदाता, चिकित्सकों और कानूनी टीम की मदद से समय-समय पर जागरूकता कक्षाओं का आयोजन करूंगी. स्कूल वार्डन और गणित एवं भौतिकी अध्यापक ने भी इसी तरह के हलफनामे दाखिल किए हैं. इसके बाद, उच्च न्यायालय ने अध्यापकों को छात्राओं के साथ अपने बच्चों जैसा व्यवहार करने का निर्देश दिया. न्यायमूर्ति बी वीरप्पा और न्यायमूर्ति के.एस. हेमालेखा की पीठ ने छात्रावास या अपने माता-पिता के साथ रहने के बारे में फैसला करना बच्चों के विवेकाधिकार पर छोड़ दिया.

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