नई दिल्ली। आरुषि-हेमराज हत्याकांड में तलवार दंपति को बरी करने के हलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2017 में तलवार दंपति को रिहा किया था. दोनों गाजियाबाद की डासना जेल में बंद थे. आरुषि-हेमराज की हत्या मई 2008 में हुई थी. इस हत्याकांड को मीडिया में खूब सुर्खियां मिली थीं और पुलिस, सीबीआई की थ्योरी पर कई सवाल उठे थे. Also Read - Coronavirus Delhi: प्रवर्तन निदेशालय के पांच कर्मचारी कोरोना पॉजिटिव, ED हेडक्वार्टर हुआ सील

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आरुषि-हेमराज हत्याकांड में तलवार दंपति को सीबीआई अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी. तलवार दंपति ने साल 2013 से अक्टूबर 2017 तक गाजियाबाद की डासना जेल में सजा काटी. इनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए अक्टूबर 2017 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोनों को बरी कर दिया था. हाई कोर्ट ने सीबीआई की थ्योरी पर सवाल उठाते हुए कहा था कि सिर्फ संदेह के आधार पर इतनी बड़ी सजा नहीं दी जा सकती. 

आरुषि हत्याकांड: हाई कोर्ट ने तलवार दंपति को किया बरी, 1418 दिन जेल में काटे

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तलवार दंपति की नाबालिग बेटी आरुषि की हत्या 15-16 मई 2008 की रात नोएडा के सेक्टर 25 स्थित घर में ही कर दी गई थी. शुरुआत में शक की सुई घर के नौकर हेमराज की ओर गई, लेकिन दो दिन बाद मकान की छत से हेमराज की लाश भी बरामद हुई जिससे मामला और उलझ गया. उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने इस हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपी थी.

तब ये कहा था कोर्ट ने

1. तलवार दंपति को किसी ने मर्डर करते नहीं देखा था, इसलिए संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए.

2. तलवार दंपति का हत्या के वक्त घर के अंदर होना उनके दोषी होने का सबूत कैसे माना जा सकता है.

3. परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से आरोप साबित नहीं होता है, इतनी बड़ी सजा तो सुप्रीम कोर्ट भी नहीं देता.

4.सीबीआई ने अपनी जांच में ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए हैं.

5.फैसले खुद बनाए तथ्यों पर नहीं होने चाहिए और साक्ष्यों को संकीर्ण नजरिए से देखना गलत है.

6. किसी को सजा देने के लिए परिस्थितिजन्य सबूत ठोस होने चाहिए, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ.

7. जिस फ्लैट में हत्या हुई, उसमें किसी तीसरे व्यक्ति के होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

8. इस मामले में सीबीआई किसी भी तरीके से सबूत पेश करने में नाकाम रही है. एजेंसी परिस्थितियों को साबित करने में विफल रही.