नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने 2005 में भाजपा नेता कृष्णानंद राय की हत्या के मामले में बुधवार को विधायक मुख्तार अंसारी और अन्य को बरी कर दिया क्योंकि सभी चश्मदीद और अहम गवाह पलट गए. अदालत ने कहा कि अभियोजन के गवाह नहीं बदले होते तो मुकदमे का फैसला अलग होता और सुनवाई के दौरान गवाह संरक्षण योजना के अभाव को रेखांकित किया. सीबीआई अदालत ने इसके साथ ही कहा कि जांचकर्ता राय समेत सात लोगों की हत्या को कथित तौर पर अंजाम देने के आरोपियों के खिलाफ आरोपों को साबित करने के लिये पर्याप्त साक्ष्य लाने में विफल रहे.

 

विशेष न्यायाधीश अरुण भारद्वाज ने मामले में सभी आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि यह सात लोगों की नृशंस हत्या से जुड़ा मामला है. मामले की जांच उप्र पुलिस से सीबीआई को स्थानांतरित कर दी गई. मुकदमे की सुनवाई को भी उत्तर प्रदेश से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया. दुर्भाग्य से सभी प्रत्यक्षदर्शियों और अन्य गवाहों के मुकर जाने से अभियोजन का पक्ष कमजोर हुआ. उन्होंने कहा कि मौजूदा मामला गवाहों के मुकरने से अभियोजन के विफल होने का एक और उदाहरण है. अगर इस मामले में गवाहों को सुनवाई के दौरान गवाह संरक्षण योजना, 2018 का लाभ मिलता तो नतीजा अलग हो सकता था.

2013 में मुकदमा यूपी के गाजीपुर से दिल्ली ट्रांसफर हुआ
कृष्णानंद राय की पत्नी अलका राय द्वारा दायर याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने 2013 में इस मामले में मुकदमा उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया था. इस हत्याकांड के वक्त राय उत्तर प्रदेश विधानसभा में मोहम्मदाबाद विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. 29 नवंबर 2005 को छह अन्य लोगों के साथ उनकी हत्या कर दी गई थी. गैंगेस्टर से राजनेता बने उत्तर प्रदेश के मऊ से विधायक अंसारी के खिलाफ हत्या और अपहरण समेत कई अन्य आपराधिक मामले भी दर्ज हैं. अंसारी के अलावा अदालत ने उसके भाई अफजाल अंसारी, एजाज-उल-हक, संजीव माहेश्वरी, राकेश पांडेय, रामू मल्लाह और मंसूर अंसारी को भी बरी कर दिया.

कृष्णानंद राय की हत्या के मामले में घटनाक्रम
उत्तर प्रदेश में 2005 में हुई भाजपा के तत्कालीन विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के मामले में घटनाओं का क्रमवार विवरण निम्नवत है:

29 नवंबर 2005 : मोहम्मदाबाद विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के तत्कालीन विधायक कृष्णानंद राय की छह अन्य लोगों के साथ हत्या कर दी गई.
21 फरवरी 2006: उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अजाज-उल-हक, अफजाल अंसारी, प्रेम प्रकाश सिंह, अता-उर-रहमान और फिरदौस के खिलाफ पहला आरोप पत्र दायर किया.
15 मार्च 2006: उप्र पुलिस द्वारा मुख्तार अंसारी के खिलाफ दूसरा आरोप-पत्र दायर किया गया.
मई 2006 : कृष्णानंद राय की पत्नी अलका राय की याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सीबीआई जांच के आदेश दिये.
मई 2006: अलका राय ने उच्चतम न्यायालय में अपनी सुरक्षा को लेकर आशंका जताते हुए मामले का स्थानांतरण करने का अनुरोध किया
30 अगस्त 2006: सीबीआई ने संजीव माहेश्वरी के खिलाफ तीसरा आरोप-पत्र दायर किया.
12 दिसंबर 2006: सीबीआई द्वारा राकेश पांडेय और रामू मल्लाह के खिलाफ चौथा आरोप-पत्र दायर किया गया.
20 मार्च 2007: सीबीआई ने मंसूर अंसारी के खिलाफ पांचवां आरोप-पत्र दायर किया.
22 अप्रैल 2013 : उच्चतम न्यायालय ने मामले के मुकदमे की सुनवाई गाजीपुर जिला अदालत से दिल्ली के सत्र न्यायालय में स्थानांतरित की.
15 मार्च 2014: मामले में प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी के खिलाफ छठा आरोप-पत्र दायर किया गया.
22 मई 2019: सीबीआई अदालत ने मामले में फैसला सुरक्षित रखा.
तीन जुलाई 2019: गवाहों के मुकरने पर अदालत ने अंसारी और छह अन्य को बरी किया. (इनपुट एजेंसी)