नई दिल्ली: केन्द्र सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के लिए शोध छात्रों से पीएचडी के लिए थीसिस की हार्ड कॉपी के बजाय ‘डिजिटल थीसिस’ को अनिवार्य करने की ‘मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय’ (एमपीएमएसयू) की व्यवस्था को स्वागत योग्य पहल बताते हुए इसे देशव्यापी स्तर पर लागू करने का भरोसा जताया है. केन्द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डा. हर्षवर्धन ने कहा है कि जबलपुर स्थित एमपीएमएसयू का यह प्रयास न सिर्फ सराहनीय है बल्कि अनुकरणीय भी है और इसे देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थाओं को अपने स्तर पर भी लागू करना चाहिए.

उल्लेखनीय है कि एमपीएमएसयू ने गत 11 दिसंबर को अधिसूचना जारी कर सभी प्रकार के शोध पत्रों और शोध कार्यों की थीसिस, डिजिटल फॉर्मेट में ऑनलाइन जमा कराना छात्रों के लिए अनिवार्य कर दिया है. विश्वविद्यालय ने इंदौर स्थित एमजी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के सह प्राध्यापक डा. मनोहर लाल भंडारी द्वारा पीएचडी की थीसिस डिजिटल फॉर्मेट में जमा करने की पहल को स्वीकार करते हुए इस व्यवस्था को सभी छात्रों के लिये लागू कर दिया है. जावड़ेकर ने विश्वविद्यालय के इस फैसले की सराहना करते हुए बताया कि शोध कार्य में बहुत अधिक मात्रा में कागज के प्रयोग को सीमित करने के लिए डिजिटल थीसिस को अनिवार्य करना बेहतर विकल्प है. उन्होंने कहा, पीएचडी की थीसिस को डिजिटल फॉर्मेट में तैयार करने पर कागज की बहुत बड़े पैमाने पर बचत होगी और यह पर्यावरण संरक्षण में मददगार साबित होगा. हम केन्द्र सरकार के अन्य संबद्ध मंत्रालयों को पत्र लिख कर एमपीएमएसयू की तर्ज पर इस व्यवस्था को अपनाने की पहल करेंगे.

उल्लेखनीय है कि डा. भंडारी ने एमपीएमएसयू में यह फैसला लागू होने के बाद 19 दिसंबर को केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री, पर्यावरण मंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिख कर इस व्यवस्था को देश भर में लागू करने का अनुरोध किया है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान का हवाला देते हुए कहा कि मौजूदा व्यवस्था में प्रत्येक शोध छात्र को औसतन 100 से 150 पेज की थीसिस की नौ प्रतियां जमा करानी होती हैं. ऐसे में बड़े पैमाने पर कागज की बचत कर वृक्षों को कटने से बचाने के लिये डिजिटल थीसिस को ही अनिवार्य बनाना समय की मांग है. डा. हर्षवर्धन ने इसे कारगर सुझाव बताते हुए कहा कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने वैज्ञानिक शोध कार्यों की थीसिस ऑनलाइन जमा कराने की व्यवस्था को पहले से ही लागू किया है. हम स्वास्थ्य मंत्रालय में भी एमपीएमएसयू के मॉडल का अध्ययन करवाकर इसे लागू करने का प्रयास करेंगे.

उल्लेखनीय है कि डा. हर्षवर्धन के पास विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की भी जिम्मेदारी है. एमपीएमएसयू की अधिसूचना में कहा गया है कि पर्यावरण की सुरक्षा तथा छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय से संबद्ध सभी महाविद्यालयों के स्नातकोत्तर छात्रों को भविष्य में पीडीएफ फॉर्मेट में थीसिस को ऑनलाइन जमा करना होगा और थीसिस का मूल्यांकन भी ऑनलाइन ही होगा. भविष्य में ‘हार्ड कापी’ में थीसिस जमा नहीं होगी. डा. भंडारी ने केन्द्रीय मंत्रालयों को लिखे पत्र में एक अध्ययन रिपोर्ट के हवाले से कहा कि एक टन कागज बनाने में 17 से 25 पेड़ों की बलि देनी पड़ती है और इसमें 400 से 500 टन पानी और 11,134 किलोवाट बिजली की भी खपत होती है. इस प्रक्रिया में 19075 गैलन पानी प्रदूषित होता है और 1140 किग्रा अपशिष्ट पैदा होता है. साथ ही कागज को सफेद बनाने में क्लोरीन सहित अन्य रसायनों का इस्तेमाल होता है. यह प्रक्रिया पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है. उन्होंने इन तथ्यों के हवाले से तीनों केन्द्रीय मंत्रियों से पीएचडी की थीसिस जमा कराने और शिक्षण संस्थाओं की निरीक्षण प्रक्रिया को पूरी तरह से ऑनलाइन बनाने का अनुरोध किया है.