नई दिल्ली: एससी- एसटी एक्‍ट के प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार आमने-सामने होते दिखाई दे रहे हैं. सरकार ने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर ही सवाल उठा दिए. एससी- एसटी एक्‍ट के प्रावधानों को कमजोर बनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश से नाखुश सरकार ने सोमवार कहा कि वह फैसले से इत्तेफाक नहीं रखती. सरकार ने सवाल उठाया कि भारत संघ को इस मामले में एक औपचारिक पक्ष क्यों नहीं बनाया गया ? कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसले में दिए गए तर्कों से इत्तेफाक नहीं रखती, जिसने एक तरह से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के पूरे उद्देश्यों को ही बदल दिया.” Also Read - No Parking No Car: दिल्ली मे कार लेने से पहले दिखाने होंगे पार्किंग के सबूत वरना नई कार के लिए करना पड़ेगा 15 साल का इंतजार

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि इस बात पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि सरकार को इस मामले में पुख्ता तौर पर पक्ष नहीं बनाया गया और उसे सिर्फ कुछ मौखिक प्रतिवेदन देने की मंजूरी दी गई. उन्होंने कहा कि हम मानते हैं कि इस तरह के संवेदनशील प्रकृति के मामलों में किसी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए निष्पक्ष आंकड़ों पर ज्यादा गहन विचार की आवश्यकता होती है. ताकि यह तय किया जा सके कि क्या कानून का दुरुपयोग हो रहा है या दलितों के खिलाफ जारी दुर्भाग्यपूर्ण गैरन्यायोचित मामलों को देखते हुए संरक्षण को बरकरार रखने की जरूरत है. Also Read - प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए पर्याप्त नियमन मौजूद, डिजिटल मीडिया का नियमन पहले हो: केंद्र

फैसले के खिलाफ केंद्र ने दायर की पुनर्विचार याचिका
केंद्र सरकार ने एससी- एसटी एक्‍ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी के प्रावधान को नरम करने संबंधी निर्णय पर पुनर्विचार का अनुरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की. सरकार ने अपनी पुनर्विचार याचिका में कहा है कि उसके 20 मार्च के फैसले से अनुसूचित जाति/जनजातियों के लिए संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त अधिकार का हनन होता है. सरकार ने न्यायालय से इस कानून के प्रावधानों को बहाल करने का अनुरोध किया है. Also Read - सुप्रीम कोर्ट ने टीवी शो पर लगाई फटकार, कहा- अन्य नागरिक के जैसा है पत्रकार, अमेरिका की तरह कोई अलग से स्वतंत्रता नहीं

खंडपीठ ने शीघ्र सुनवाई से किया किया इनकार
इस बीच, न्यायालय ने 20 मार्च के फैसले पर रोक लगाने और इस पर पुनर्विचार के लिए अनुसूचित जाति/जनजातियों के संगठनों के अखिल भारतीय महासंघ की याचिका पर शीघ्र सुनवाई करने से इंकार कर दिया. सीजेआई दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस धनंजय वाई चंद्रचूड की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि इस याचिका पर उचित समय पर ही विचार किया जाएगा.

150 कर्मचारी समूहों का महासंघ
अनुसूचित जाति/जनजातियों के संगठनों के अखिल भारतीय महासंघ करीब 150 कर्मचारी समूहों का महासंघ है. महासंघ ने याचिका में कहा है कि इस मुद्दे को लेकर देश में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और इसमे अनेक व्यक्तियों की जान गई है. अत: न्यायालय को याचिका पर शीघ्र सुनवाई करनी चाहिए. महासंघ की ओर से वकील मनोज गौरकेला ने कहा कि शीर्ष कोर्ट का 20 मार्च का फैसला अनुचित है और इस पर रोक लगाई जानी चाहिए. साथ ही उन्होंने इस याचिका पर 5 सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा विचार करने का भी अनुरोध किया.

कोर्ट ने अपने फैसले में ये बातें कहीं थीं
शीर्ष कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि कई मौकों पर निर्दोष नागिरकों को आरोपी बनाया जा रहा है और लोक सेवक अपने कर्तव्य निर्वहन करने में भयभीत हैं, यह कानून बनाने समय विधायिका की ऐसी कोई मंशा नहीं थी. कोर्ट ने कहा था कि अग्रिम जमानत को इस प्रावधान से बाहर रखने को सही मामलों तक सीमित करने और ऐसे प्रकरणों में जहां पहली नजर में कोई मामला नहीं बनता है, उन्हें इसके दायरे से बाहर रखे बगैर निर्दोष व्यक्ति को कोई संरक्षण प्राप्त नहीं होगा. कोर्ट ने कहा था कि इस कानून के तहत गिरफ्तारी के प्रावधान के दुरूपयोग के मद्देनजर लोकसेवक की गिरफ्तारी सिर्फ उसकी नियुक्ति करने वाले प्राधिकार और गैर लोक सेवक के मामले में एसएसपी की मंजूरी से ही की जा सकती है. (इनपुट: एजेंसी)