नई दिल्ली: देश भर में होली मनाई गई. बच्चों ने जमकर होली खेली. एक दूसरे को रंग लगाया ही, बड़ों को भी नहीं छोड़ा. मस्ती एकदम ‘बाली उमर’ वाली थी. बिलकुल वैसी ही जैसी ज़िन्दगी 50-50 के युवा लेखक भगवंत अनमोल (Bhagwant Anmol) ने अपनी किताब ‘बाली उमर’ में रचा है. भगवंत के नए उपन्यास में बच्चों के बचपन का अल्हड़पन, उनकी शरारतें और ज़िन्दगी के बारे में सब कुछ जान लेने की तीव्र उत्सुकता का बेहद रोचक ढंग से वर्णन किया गया है. उपन्यास के मुख्य किरदार बच्चे हैं और कथानक एक गाँव का होते हुए भी यह न बच्चों के लिए है और न ही मात्र आंचलिक है नवाबगंज के दौलतपुर मोहल्ले के बच्चे जहाँ एक ओर अपनी शरारतों से पाठक को उसके बचपन की स्मृतियों में ले जाते हैं तो दूसरी ओर उनके मासूम सवाल हमारे देश-समाज के सम्बन्ध में सोचने पर विवश कर देते हैं. Also Read - पति विक्रांत संग मोनालिसा ने जमकर खेली होली, प्यार के रंगों में डूबा ये कपल

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‘बाली उमर’ बच्चों के माध्यम से अपने समय की राजनीति और जातीय-क्षेत्रीय पहचानों के संघर्ष की पहचान करता उपन्यास भी है कहीं भाषा के नाम पर, कहीं पहचान के नाम पर वैमनस्य बढ़ता जा रहा है और इन सबके बीच भारतीयता की पहचान धुंधली होती जा रही है, आपसी खाई बढ़ती जा रही है यह उपन्यास अपने समय के संदर्भों को सही-सही समझने की माँग करता है शुरू से आखिर तक दिलचस्प किरदारों की मासूम शरारतों के सहारे लेखक ने बहुत रोचक शैली में अपनी बात कही है. भगवंत अनमोल उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के ‘बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ पुरस्कार 2017 से सम्मानित हो चुके हैं. उनकी पुस्तक ‘ज़िन्दगी 50-50’ पर कई विद्यार्थी शोध कर रहे हैं. Also Read - मीरा राजपूत ने जाहिर किया प्यार, गर्दन पर बनवाया शाहिद के नाम का टैटू

होली के मौके पर भगवंत अनमोल कहते हैं कि बचपन में होली का हुड़दंग भी कुछ अलग ही होता है. जो जोश होली के दिन होता है, वैसा शायद किसी त्यौहार पर होता है. वक़्त कितना ही बदले लेकिन कई चीज़ें हैं जो बच्चों में कभी नहीं बदल सकती. आज कई बड़ी उम्र के लोग होली से दूरी बना लेते हैं, कहा जाता है कि वक़्त काफी बदल गया है, लेकिन बच्चे उसी अंदाज़ में ही नज़र आते हैं.